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खुदा पर शायरी

खुदा पर शायरी
खुदा पर शायरी

वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़्याल-ए-रोज़ जज़ा गया
नामालूम

ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैंने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वां की बेनियाज़ी का
मीर तक़ी मीर

ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा ना करते हम
कि याद बुत से हरम में बका ना करते हम
क़लक़ मेरठी

कश्तियां सबकी किनारे पे पहुंच जाती हैं
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
अमीर मीनाई

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं
सुदर्शन फ़ाकिर

आशिक़ी से मिलेगा ए ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
दाग़ देहलवी

ए सनम जिसने तुझे चांद सी सूरत दी है
इसी अल्लाह ने मुझको भी मुहब्बत दी है
हैदर अली आतिश

खुदा पर शायरी

ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई ना दे
बशीर बदर

बस जान गया में तेरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
अकबर इला आबादी

इतना ख़ाली था अंदरूँ मेरा
कुछ दिनों तो ख़ुदा रहा मुझमें
जून ईलिया

वफ़ा जिससे की बेवफ़ा हो गया
जिसे बुत बनाया ख़ुदा हो गया
हफ़ीज़ जालंधरी

ख़ुदा से मांग जो कुछ माँगना है ऐ अकबर
यही वो दर है कि ज़िल्लत नहीं सवाल के बाद
अकबर इलाहाबादी

मुझको ख़ाहिश ही ढ़ूढ़ने की ना थी
मुझमें खोया रहा ख़ुदा मेरा
जून ईलिया

इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाह
बख़श देना तो तेरी फितरत है
नामालूम

दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़-ए-ख़ुदा था पहले
ये ज़माना कभी इतना ना बुरा था पहले
मौज फ़तहगढ़ी

कोई जन्नत तो कोई क़ुरब ख़ुदा मांगता है
तेरा दरवेश मगर ,तेरी रज़ा मांगता है
उवैस अहमद वैसी

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