ख़ौफ़ पर शायरी

ख़ौफ़ पर शायरी

ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा ना करते हम
कि याद बुत से हर्म में बका ना करते हम
क़लक़ मेरठी

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
शीशे के महल बना रहा हूँ
क़तील शिफ़ाई

वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़्याल-ए- रोज़े जज़ा गया

होश आने का था जो ख़ौफ़ मुझे
मय-कदे से ना उम्र-भर निकला
जलील मानक पूरी

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम
नामालूम

ख़ौफ़ आता है अपने साये से
हिज्र के किस मुक़ाम पर हूँ मैं
सिराज फ़ैसल ख़ान

क्या मौसमों के टूटते रिश्तों का ख़ौफ़ है
शीशे सजा लिए हैं सभी ने दुकान पर
सय्यद आरिफ़

ख़ौफ़ पर शायरी

अजीब ख़ौफ़ का आलम है अपने चारों तरफ़
सफ़र में लगता है ये आख़िरी सफ़र तो नहीं
सय्यद रियाज़ रहीम

मैंने कहा था मुझको अंधेरे का ख़ौफ़ है
उसने ये सुनके आज मेरा घर जला दिया
सीमा ग़ज़ल

इक दूसरे से ख़ौफ़ की शिद्दत थी इस क़दर
कल रात अपने आपसे मैं ख़ुद लिपट गया
फ़र्हत अब्बास

हादिसों के ख़ौफ़ से एहसास की हद में ना था
वर्ना नफ़स मुतमइन सफ़्फ़ाक होता ग़ालिबन
राही फ़िदाई

दूर तक फैला हुआ है एक अंजाना सा ख़ौफ़
इस से पहले ये समुंद्र इस क़दर बरहम ना था
शमीम फ़ारूक़ी

ख़त तो भेजा है पर अब ख़ौफ़ यही है दिल में
मैंने क्या उस को लिखा और वो क्या समझेगा
मजनूं अज़ीमाबादी

कभी सय्याद का खटका है कभी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ
बुलबुल अब जान हथेली पे लिए बैठी है
महलक़ा चंदा

ख़ौफ़ पर शायरी

ना ख़ौफ़-ए-बर्क़ ना ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे
ख़ुद अपने बाग़ को फूलों से डर लगे है मुझे
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

ख़ौफ़ दोज़ख़ से कभी ख़्वाहिश-ए-जन्नत से कभी
मुझको इस तर्ज़ इबादत पे हंसी आती है
नामालूम

फितरत में आदमी की है मुबहम सा एक ख़ौफ़
इस ख़ौफ़ का किसी ने ख़ुदा नाम रख दिया
गोपाल मित्तल

क़मर ज़रा भी नहीं तुमको ख़ौफ़-ए-रुस्वाई
चले हो चांदनी शब में उन्हें बुलाने को
क़मर जलालवी

ख़ौफ़ ग़र्क़ाब हो गया फ़ैसल
अब समुंद्र पे चल रहा हूँ मैं
फ़ैसल अजमी

ख़ौफ़ हर घर से झाँकता होगा
शहर इक दश्त बे-सदा होगा
मुनीर सैफी

दोनों के दिल में ख़ौफ़ था मैदान-ए-जंग में
दोनों का ख़ौफ़ फ़ासिला था दरमयान का
मुहम्मद अलवी
Thinkerbabu

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