कंगना राणावत

कंगना राणावत का बयान

अभिनेत्री कंगना राणावत ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से शत प्रतिशत मिथ्या हैं. लेकिन इन बयानों का विरोध करने वालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है।

कौन है कंगना राणावत ?

कंगना रनौत हिन्दी फिल्मों की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं।और अपने बेबाक बयानों की वजह से हमेशा चर्चा मैं रहती हैं।

कंगना राणावत का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

कंगना राणावत का जन्म हिमाचल प्रदेश में 23 मार्च, 1987 को हुआ।

कंगना राणावत को बॉलीवुड की क्वीन क्यों कहा जाता है ?

साल 2014 में आई उनकी फिल्म क्वीन ने ब्लॉक बस्टर कामयाबी हासिल की। इस फिल्म में अपने दमदार और जबरदस्त अभिनय के कारण कंगना को बॉलीवुड की क्वीन कहा जाने लगा ।


“कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आने वाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!” -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहनने वाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?


कोई ‘क्या’ कह रहा है, इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं।


आज़ादी भीख में मिलने वाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं. टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।


प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अस्सार साबित कर देंगे. इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।


कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो. कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।


नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गए और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लग गए। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लग. नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे. चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे. किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया.


क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है. लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?


कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है. इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?


कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी. अन्यथा हर काम वोट के लिए करने वाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो.


कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो. कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है. कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है. कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है. कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है. हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लंबित हैं.


हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते.
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं. राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं. यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी हैं. क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।


पुनश्च, मैं कंगना राणावत के बयान से असहमत हूँ, किन्तु उनकी कुतर्क क्षमता का प्रतिकार करते समय मुझे उनकी फिल्मों पर निभाई जा रही भूमिकाओं और निजी जीवनशैली में झाँकने का कोई अधिकार नहीं है। (कंगना राणावत)

लेखक: चिराग़ जैन

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