कागज पर शायरी

कागज पर शायरी

लिख के रख देता हूँ अलफ़ाज़ सभी काग़ज़ पर
लफ़्ज़ ख़ुद बोल के तासीर बना लेते हैं
मुहम्मद मुस्तहसिन जामी

कभी मैं ढलता हूँ काग़ज़ पे नक़्श की सूरत
मैं लफ़्ज़ बन के किसी की ज़बां में तैरता हूँ
ख़ावर नक़वी

हर लफ़्ज़ को काग़ज़ पे उतारा नहीं जाता
​हर नाम सर-ए-आम पुकारा नहीं जाता
इनाम उल-हक़ जावेद

किताब-ए-क़िस्मत में कोरे-काग़ज़ भी पाए जाते हैं चीदा चीदा
कि जिनमें दम हो, वो अपने हाथों से अपनी तक़दीर आप लिख लें
रहमान हफ़ीज़

अमीर-ए-शहर ने काग़ज़ की कश्तियां देकर
समुंद्रों के सफ़र पर किया रवाना हमें
मुहसिन नक़वी

सिर्फ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हंसी अपनी जगह
अनवर शऊर

वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देखकर
मैं इस को आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं
ज़हूर नज़र

कागज पर शायरी

बनाचुका हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पे सबज़ अश्जार
और अब परिंदों का चहचहाना बना रहा हूँ
अदनान बैग

क़लम से, हर्फ़ से, काग़ज़ से क्या नहीं मुम्किन
सिखा रही है मुहब्बत भी जिद्दतें कैसी
आ हुस्न मिर्ज़ा

कैसी तर्तीब से काग़ज़ पे गिरे हैं आँसू
एक भूली हुई तस्वीर उभर आई है
इक़बाल अशअर

चाँद-सा मिसरा अकेला है मेरे काग़ज़ पर
छत पे आ जाओ, मेरा शेअर मुकम्मल कर दो
बशीर बदर

अब डूबने लगे हैं तो एहसास ये हुआ
काग़ज़ की कश्तीयों में सफ़र कर रहे थे हम
मुस्तुफ़ाई शहाब

नाम सादा-काग़ज़ पर लिख के रह गए उस का
इस से आगे क्या लिखते कुछ लिखा ना जाता था
नज़ीर क़ैसर

लफ़्ज़ मर जाएं तो मफ़हूम भी मर जाते हैं
कितने काग़ज़ के कफ़न ख़ून से भर जाते हैं
नामालूम

ग़ज़ल


आदिल रज़ा मंसूरी

चांद तारे बना के काग़ज़ पर
ख़ुश हुए घर सजा के काग़ज़ पर

बस्तीयां क्यों तलाश करते हैं
लोग जंगल उगा के काग़ज़ पर

जाने क्या हमसे कह गया मौसम
ख़ुशक पित्ता गिरा के काग़ज़ पर

हंसते हंसते मिटा दिए उसने
शहर कितने बसा के काग़ज़ पर

हमने चाहा कि हम भी उड़ जाएं
एक चिड़िया उड़ा के काग़ज़ पर

लोग साहिल तलाश करते हैं
एक दरिया बहा के काग़ज़ पर

नाव सूरज की धूप का दरिया
थम गए कैसे आ के काग़ज़ पर

ख़ाब भी ख़ाब हो गए आदिल
शक्ल-ओ-सूरत दिखा के काग़ज़ पर

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