झील पर शायरी

झील पर शायरी

वो लाला बदन झील में उतरा नहीं वर्ना
शोले मुतवातिर इसी पानी से निकलते
महफ़ूज़ अलरहमान आदिल

सामने झील है झील में आसमाँ
आसमाँ में ये उड़ता हुआ कौन है
फ़ारूक़ शफ़क़

सूख गई जब आँखों में प्यार की नीली झील क़तील
तेरे दर्द का ज़र्द समुंद्र काहे शोर मचाएगा
क़तील शिफ़ाई

गहिरी ख़मूश झील के पानी को यूं ना छेड़
छींटे उड़े तो तेरी क़बा पर भी आएँगे
मुहसिन नक़वी

इन झील सी गहिरी आँखों में
इक लहर सी हर-दम रहती है
रसा चुग़्ताई


मेरी ख़ामोशियों की झील में फिर
किसी आवाज़ का पत्थर गिरा है
आदिल रज़ा मंसूरी

चिराग़ ,चाँद ,शफ़क़, शाम ,फूल, झील, सबा
चुराईं सबने ही कुछ-कुछ शबाहतें तेरी
अंजुम इर्फ़ानी

झील पर शायरी

वो फूल हो सितारा हो शबनम हो झील हो
तेरी किताब-ए-हुस्न के सब इक़तिबास थे
इशफ़ाक़ नासिर

ये आब-दीदा ठहर जाये झील की सूरत
कि एक चाँद का टुकड़ा नहाना चाहता है
मुस्तफ़ा शहाब

वो गुलाबी बादलों में एक नीली झील सी
होश क़ायम कैसे रहते था ही कुछ ऐसा लिबास
नुसरत गोवा लियारी

लहू की सूखी हुई झील में उतर कर यूं
तलाश किस को वो करता रहा मेरे अंदर
अलीम सबा नवेदी

पुरसकूं लगती है कितनी झील के पानी पे बत
पैरों की बे-ताबियाँ पानी के अंदर देखिए
जावेद अख़तर

कुछ लोग हैं जो झेल रहे हैं मुसीबतें
कुछ लोग हैं जो वक़्त से पहले बदल गए
शकील जमाली

मैंने हँसने की अज़ीयत झेल ली रोया नहीं
ये सलीक़ा भी कोई आसान जीने का ना था
सिद्दीक़ मुजीबी

झील पर शायरी


जिस क़दर नीचे उतरता हूँ मैं
झील भी गहिरी हुई जाती है
अख़तर होशयार पूरी

ख़ुदा मालूम किस आवाज़ के प्यासे परिंदे
वो देखो ख़ामुशी की झील में उतरे परिंदे
कैफ़ अहमद सिद्दीक़ी

देख लिया क्या जाने शाम की सूनी आँखों में
झील में सूरज अपनी सारी लाली डाल गया
राम अवतार गुप्ता मज़ज़र

कोई कंकर फेंकने वाला नहीं
कैसे फिर हो झील में हलचल कोई
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

मुझे ये ज़िद है कभी चांद को असीर करूँ
सो अब के झील में इक दायरा बनाना है
शहबाज़ ख़्वाजा

जल-थल का ख़ाब था कि किनारे डुबो गया
तन्हा कंवल भी झील से बाहर निकल पड़ा
सईद अहमद

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