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इंतज़ार पर शायरी

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इंतज़ार पर शायरी
इंतज़ार पर शायरी

माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख, मेरा इंतिज़ार देख
अल्लामा इक़बाल
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मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आएगा यहां कौन है आने वाला
अहमद फ़राज़
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शायद तुम आओ मैंने इसी इंतिज़ार में
अब के बरस की ईद भी तन्हा गुज़ार दी
नामालूम
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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हमको
देर से इंतिज़ार है अपना
मीर तक़ी मीर
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शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में ना पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चिराग़ जला दिया, कभी इक चिराग़ बुझा दिया

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हम इंतिज़ार करेंगे तेरा क़ियामत तक
ख़ुदा करे कि क़ियामत हो और तू आए
मुहसिन नक़वी
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उसे ख़बर ही नहीं क्या है इंतिज़ार का दुख
मैं उसके पास कभी देर से गया ही नहीं
आयत देहलवी
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इंतज़ार पर शायरी


आँखों को इंतिज़ार का देकर हुनर चला गया
चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया
जून एलिया
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आज भी उस का इंतिज़ार करते करते दिन बीते
अना-परस्त लोग हैं मर्ज़ी से याद करते हैं

तेरी सदा का है सदीयों से इंतिज़ार मुझे
मेरे लहू के समुंद्र ज़रा पुकार मुझे
ख़लील अल रहमान अज़मी
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हमको तो इंज़ार-ए-सहर भी क़बूल है
लेकिन शब-ए-फ़िराक़ तेरा क्या उसूल है
क़तील शिफ़ाई
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जिसे ना आने की कसमें मैं दे के आया हूँ
उसी के क़दमों की आहट का इंतिज़ार भी है
काविश सुह्रवर्दी
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जानता है कि वो ना आएँगे
फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल
नामालूम
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इंतज़ार पर शायरी


ये कैसा नशा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ
मुनीर नियाज़ी

इक रात वो गया था जहां बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के
फ़र्हत एहसास
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गलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ना कोई वादा ना कोई यक़ीं ना कोई उम्मीद
मगर हमें तो तेरा इंतिज़ार करना था
फ़िराक़-गोरखपुरी
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जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना
वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था
जून ईलिया
۔
तेरे आने की क्या उम्मीद मगर
कैसे कह दूं कि इंतिज़ार नहीं
फ़िराक़-गोरखपुरी
۔
वो ना आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे
परवीन शाकिर

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