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इंक़िलाब शायरी

इंक़िलाब शायरी
इंक़िलाब शायरी

कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़ाब थे
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे
हसननईम

हम परवरिश लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुलम के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही
साहिर लुधियानवी

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहीए
दुष्यंत कुमार

देख रफ़्तार इन्क़िलाब-ए- फ़िराक़
कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़
फ़िराक़-गोरखपुरी


दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के काबिल
जिस शख़्स ने हालात का रुख मोड़ दिया हो
नामालूम

इंक़िलाब शायरी

ज़ुलम फिर ज़ुलम है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
साहिर लुधियानवी

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
इस इन्क़िलाब का जो आज तक उधार सा है
कैफ़ी आज़मी

इन्क़िलाब आएगा रफ़्तार से मायूस ना हो
बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं
अली सरदार जाफ़री

सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चिराग़
जहां तलक ये सितम की सियाह-रात चले
मजरूह सुलतानपुरी


ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इन्क़िलाब देखेंगे
अहमक़ फफूंदवी

काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा नारा इन्क़िलाब-ओ-इन्क़िलाब-ओ-इन्क़िलाब
जोश मलीहाबादी

इंक़िलाब शायरी

रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इन्क़िलाब
चंद शम्मों के भड़कने से सह्र होती नहीं
क़ाबिल अजमेरी

इन्क़िलाब सुबह की कुछ कम नहीं ये भी दलील
पत्थरों को दे रहे हैं आइने खुल कर जवाब
हनीफ़ साजिद

बहुत बर्बाद हैं लेकिन सदाए इन्क़िलाब आए
वहीं से वो पुकार उट्ठेगा जो ज़र्रा जहां होगा
अली सरदार जाफ़री

ऐ इन्क़िलाब नौ, तेरी रफ़्तार देखकर
ख़ुद हम भी सोचते हैं कि अब तक कहाँ रहे
शौकत परदेसी

इन्क़िलाबों की घड़ी है
हर नहीं , हाँ से बड़ी है
जां निसार अख़तर

इन्क़िलाबाते दहर की बुनियाद
हक़ जो हक़दार तक नहीं पहुंचा
साहिर लुधियानवी

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