इन्क़िलाब शायरी

इन्क़िलाब शायरी

हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुलम के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही
साहिर लुधियानवी
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काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा नारा इन्क़िलाब-ओ-इन्क़िलाब-ओ-इन्क़िलाब
जोश मलीहाबादी
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और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना
हबीब जालिब
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चलते हैं दबे पांव कोई जाग ना जाये
गु़लामी के असीरों की यही ख़ास अदा है
होती नहीं जो क़ौम , हक़ बात पे यकजा
इस क़ौम का हाकिम ही बस उन की सज़ा है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ज़ुलम सहना भी तो ज़ालिम की हिमायत ठहरा
ख़ामुशी भी तो हुई पुश्तपनाही की तरह
परवीन शाकिर
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हैरत है कि तालीम-ओ-तरक़्क़ी में है पीछे
जिस क़ौम का आग़ाज़ ही इक़रा से हुआ था
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मुंसिफ़-ए-वक़्त है तो और मैं मज़लूम मगर
तेरा क़ानून मुझे फिर भी सज़ा ही देगा
मुनव्वर राना
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इन्क़िलाब शायरी


अभी तक पांव में लिपटी हैं ज़ंजरीरें गु़लामी की
दिन आ जाता है आज़ादी का , आज़ादी नहीं आती
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तारीख़ की स्याही चेहरों पे अपने मल के
करते हैँ हम गु़लामी, आक़ा बदल बदल के
सिकन्दर अक़ील

ज़ुलम फिर ज़ुलम है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
साहिर लुधियानवी
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इन्क़िलाब आएगा रफ़्तार से मायूस ना हो
बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं
अली सरदार जाफ़री
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रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इन्क़िलाब
चंद शम्मों के भड़कने से सहर होती नहीं
क़ाबिल अजमेरी
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ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इन्क़िलाब देखेंगे
अहमक़ फफूंदवी
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इन्क़िलाब सुबह की कुछ कम नहीं ये भी दलील
पत्थरों को दे रहे हैं आइने खुल कर जवाब
हनीफ़ साजिद
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बहुत बर्बाद हैं लेकिन सदाए इन्क़िलाब आए
वहीं से वो पुकार उट्ठेगा जो ज़र्रा जहां होगा
अली सरदार जाफ़री

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