हिंदी सिनेमा

फिल्में जिनकी अब शायद आवाजें भर बची हैं

सत्तर का दशक हिंदी सिनेमा में दिलचस्प बदलाव लेकर आया था। कामर्शियल ट्रेंड सेटर से लेकर समांतर सिनेमा आंदोलन को गति देने वाली फिल्में इसी दशक के आरंभिक वर्षों में आईं। लेकिन उन सालों में बहुत सी ऐसी फिल्में भी रिलीज हुईं जो न इस खांचे में फिट बैठती थीं, न उस खांचे में। न तो आप उन फिल्मों को तथाकथित आर्ट सिनेमा कह सकते थे और न ही ये परंपरागत अर्थों में मुख्यधारा की फिल्में रही होंगी।
साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक के पूर्वार्ध के खाते में बहुत सी गुमनाम फिल्में शामिल हैं।

ये फिल्में अब कहां है, कोई नहीं जानता। या कह लें कि किसी को दिलचस्पी ही नहीं होगी। फेसबुक पर साझा करने पर शायद कुछ लोग अपनी स्मृतियों को टटोल सकें और इन फिल्मों से जु़ड़ी कुछ बातें, कुछ यादें सामने आ सकें। कुछ फिल्में तो ऐसी हैं, जिनके नाम भी बहुत अलग से हैं।

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इन फिल्मों से जुड़ी बस दो ही चीजें आपको मिलेंगी, पहली गीत- क्योंकि ग्रामोफोन कंपनियों से इनकी रिकार्डिंग सहेजकर रखी और दूसरे इनके पोस्टर, जो संयोग से इंटरनेट पर कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं। सन् 1973 में ऐसी ही एक अजीब सी फिल्म आई थी, जिसका शीर्षक था, ‘चिमनी का धुआँ’। इसका एक दूसरा शीर्षक ‘प्रायश्चित’ भी कहीं-कहीं दिखता है। ‘चिमनी का धुआँ’ फिल्म का शीर्षक क्यों रहा होगा? बहुत ही गैर-पारंपरिक शीर्षक है। क्या इसमें फैक्टरियों की बात होगी, या मज़दूर आंदोलन की? या प्रदूषण की?


फिल्म का निर्देशन प्रभात मुखर्जी ने किया था, जिन्होंने बंगाली, असमिया और उड़िया भाषा में फिल्में बनाई थीं, उनकी असमिया फिल्म को 1960 के बर्लिन फिल्म महोत्सव में दिखाया गया था। उन्होंने ही एक और दुर्लभ फिल्म जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए निर्देशित की जिसका शीर्षक था, ‘शायर-ए-कश्मीर महजूर’। इस फिल्म में बलराज साहनी केंद्रीय भूमिका में थे। इसमें तलत महमूद की आवाज़ में गीत खोजकर सुनिए “ओ खेतों की शहजादी, कुरबान तुझ पे वादी”, यह एक बड़ा ही खूबसूरत गुनगुनाता-सा गाना है।


महजूर (पीरज़ादा गुलाम अहमद) कश्मीर की घाटी में एक शायर थे, जो अपनी क्रांतिकारी शायरी के लिए जाने जाते थे। दुर्भाग्य से घाटी से परे उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। बलराज साहनी कश्मीर घाटी में इस शायर की जबरदस्त लोकप्रियता से इतने प्रभावित हुए कि सन् 1960 में उन्होंने इस शायर के जीवन को सेल्युलाइड पर उतारने का फैसला किया। ऐसी चर्चा थी फिल्म बनने में बहुत समय लगा था और यह करीब 12 साल बाद 1972 में रिलीज हो पाई थी।


प्रभात मुखर्जी की जिस फिल्म फिल्म ‘चिमनी का धुआँ’ से हमने बात शुरू की थी, उसके भी गीत बहुत खूबसूरत हैं, जो इस फिल्म के बारे में खासी उत्सुकता जगाते हैं। सुमन कल्याणपुर मुझे हमेशा से बहुत पसंद हैं, उनकी आवाज़ में एक इस फिल्म का एक गीत है,
आज रोते नयन मेरे
ढल गए सपने सुनहरे
याद आती वो घड़ी
जब बजे शहनाइयां


यह एक धीमी गति का अकेलेपन वाला और उदास करने वाला गाना है और इसके संगीत में सत्तर के दशक का अंदाज़ नहीं है। संगीतकार के बारे में जल्दी जानकारी नहीं मिलती मगर इसका संगीत शायद रॉबिन चटर्जी का है। इसको सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे हम 50 के दशक का कोई गीत सुन रहे हैं। संभवतः यह फिल्म देर से बनकर रिलीज हुई होगी। इसी तरह से “बिछुओं की रुनझुन” गीत में महेंद्र कपूर और सिप्रा बासु का अवधी बोलों में डुएट एक अलग-थलग सा प्रयोग है। संध्या मुखर्जी की आवाज़ में “बीत जाएगी उमरिया” और आरती मुखर्जी की आवाज़ में “तुम हमारे हो, तुम्ही से मुस्कुराती ज़िंदगी” भी बहुत अलग किस्म का है। इन गानों को रात में अकेले सुनें तो ये आपको किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं।


प्रभात मुखर्जी के निर्देशन में बनी एक और बड़ी ही भूली-बिसरी सी फिल्म है ‘सोनल’। इसकी खूबी यह है कि इसमें मशहूर नर्तकी मल्लिका साराभाई केंद्रीय भूमिका में हैं। लेकिन इस फिल्म के बारे में कोई जानता भी है?

अब इसके संगीत को तलाशें तो वह मिलजाता है। फिल्म का संगीत है भी बहुत सुंदर। खास तौर पर लता मंगेशकर की आवाज में गाया गया गीत “हल्का हल्का छलका छलका”। हमेशा की तरह लता की आवाज की गहराई, कौशल और उतार-चढ़ाव आपका ध्यान खींचता है। सुंदर शब्दों वाला यह गीत लिखा था योगेश ने, जिनके लिखे का जादू ‘रजनीगंधा’ जैसी फिल्मो में हम देख चुके है। गीत क्या जैसे बड़े कौशल से लिखी गई कविता है, इसके बोल इस तरह हैं-


हल्का हल्का
छलका छलका
ये क्या रंग जीवन में
जानूं ना जानूं ना
सूनी सूनी राह में
आँचल मेरा थाम के
दिल ने हँस कर दी सदा
क्यों मुझे प्यार के नाम से
सोचूं मैं कैसे ढली
बदले बदले रूप में
खिलकर कैसे छा गई
चांदनी आज ये धूप में
ये हलचल है क्या मन में
जानूं ना जानूं ना
हल्का हल्का
छलका छलका


योगेश के शब्दों का चयन उनके लिखे गीतों एक काव्यात्मक ऊँचाई देता था। “साथी अलबेले हैं” गीत में मन्ना डे की आवाज सुनना भी सुखद है। लता की आवाज़ में एक और बहुत सी प्यारा गीत है, जिसके बोल हैं, “ये महका मौसम और ये तनहाई”। इसे सुनें, यह बहुत सुंदर, मीठा और उल्लास से भरा गीत है। इस गीत में मानों प्रकृति खुद आकर बस गई है। ‘सोनल’ फिल्म का फिल्म का पोस्टर भी देखते बनता है। बहुत ही सुंदर आर्टवर्क जिसमें शीर्षक के ठीक ऊपर मल्लिका साराभाई को पूरी अहमियत देते हुए उनका नाम लिखा है। इस फिल्म का पोस्टर पुराने दौर के उपन्यासों के कवर की याद दिलाता है।


सन् ’75 में इसी मशहूर नर्तकी मल्लिका साराभाई की एक और गुमनाम सी फिल्म ‘मुट्ठी भर चावल’ आई थी। इसमें वे राकेश पांडे के अपोजिट थीं। इस फिल्म को तो इंटरनेट पर खोजना भी बहुत मुश्किल है। सर्च करने पर इसी नाम से पाकिस्तान की फिल्म आती है। इस फिल्म का निर्देशक सुरेंद्र शैलज ने किया था। फिल्म का पोस्टर देखकर यह एक ऑफबीट या आर्ट फिल्म नज़र आती है। बहुत संभव है कि यह फिल्म भी लेट रिलीज हुई हो।


फिल्म की थीम या प्लॉट के बारे में कुछ खास जानकारी नहीं मिलती है। यह पता नहीं चलता कि यह फिल्में देर से रिलीज हुई थी या नहीं मगर इसके गीत सत्तर के दशक के मिजाज़ से मेल नहीं खाते हैं। मुकेश की आवाज़ में बहुत सुंदर गाना है जो जल्दी सुनने को नहीं मिलता है, गीत के बोल हैं, “काहे पगली बरखा छाई, तेरे इन दो नैनन में”। इसकी धुन में ही कुछ ऐसी तासीर है कि सुनते ही दिल में एक कचोट सी उठती है। महेंद्र कपूर और जगजीत कौर की आवाज़ में “अच्छा क्या है बुरा है क्या” गीत भी बढ़िया है। वहीं आशा भोंसले की आवाज़ में एक गीत “सारी रतिया मचाए उत्पात सिपहिया सोने न दे” भी संभवतः परंपरागत मुजरे के लिए रिकार्ड किया गया होगा मगर कहीं से सस्ता नहीं लगता।


ऐसी ही एक और फिल्म है ‘त्यागपत्र’। यह इसी नाम से लिखे गए जैनेंद्र कुमार के उपन्यास पर आधारित थी। यह फिल्म भी सत्तर के दशक में रिलीज हुई थी। जाने यह फिल्म कैसी होगी, फिल्म के पोस्टर लिखा है, ‘अ वूमन्स रिवोल्ट, अ मैन्स डिलेमा ऑफ कान्सिएंस’. इंटरनेट पर इस फिल्म का नाम और रिलीज डेट तो मौजूद है मगर इस फिल्म के निर्देशक तक का नाम नहीं है। फिल्म के एक पोस्टर से पता लगता है कि इसके निर्देशक रमेश गुप्ता थे। मुझे बचपन में सुने इसके रेडियो प्रोमो आज भी याद हैं। उन दिनों इसका एक गीत रेडियो पर अक्सर बजता था,
ये सिंदूरी शाम
छेड़ती है मन के तार
जी करता है उड़कर पहुँचूं
दूर गगन के पार


इस गीत को गाया था दिलराज कौर ने और संगीत था अजय स्वामी का। ये सुंदर गीत इन दिनों बड़ी मुश्किल से सुनने को मिलता है। इस गीत को सुनते ही मेरे मन में एक खुला आसमान, तेज हवाएं और ढलता लाल सूरज कौंध जाते हैं। इस गीत में कुछ ऐसा ही खुलापन है। आप बंद कमरे के भीतर भी आसमान महसूस कर सकते हैं। इस गीत को इस तरह कंपोज़ किया गया है कि यह बोलचाल का अहसास देता है।


डैनी, किरण कुमार और अंजलि अभिनीत फिल्म ‘घटना’ 1974 में रिलीज हुई थी। अब यह फिल्म भी नहीं मिलती है। इस फिल्म में एक विवाहित स्त्री को ब्लैकमेल किए जाने की कहानी थी। कहते हैं कि इसके पोस्टर अपने समय में बहुत बोल्ड थे और इन पर आपत्ति करते हुए लगने के अगले दिन ही इसे हटा दिया गया। फिल्म के के संगीतकार रवि ने ही इसके बोल भी लिखे थे। इसमें लता मंगेशकर की गाई एक ग़ज़ल है। यह लता मंगेशकर के बहुत सुंदर मगर कुछ अनसुने गीतों में से एक है। इसके बोल कुछ इस तरह हैं –
हजार बातें कहे ज़माना,
मेरी वफा पर यकीन रखना
हर एक अदा में है बेगुनाही,
मेरी अदा पे यकीन रखना


और अंत में, सन् 1973 में आई फिल्म ‘प्रेम पर्वत’ का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। सुनते हैं कि वेद राही के निर्देशन में बनी इस फिल्म का प्रिंट आग में जल गया और रेहाना सुल्तान और नाना पल्सीकर की यह फिल्म हमेशा के लिए खो गई। इसका गीत “ये दिल और उनकी निगाहों के साए” आज भी जाने कितने लोगों के दिल को छू जाता है। लगता है जैसे, घने पेड़ों से ढकी किसी पगंडडी पर, धूप से आँख-मिचौली करती, एक लड़की गुनगुनाती, भागती जा रही है। जयदेव के कंपोजिशन में यह गीत इतना मधुर है कि शब्दों और ध्वनियों से आपकी आँखों के आगे चित्र बनते चले जाते हैं। देखिए,


पहाड़ों को चंचल, किरन चूमती है
हवा हर नदी का बदन चूमती है
यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये
लिपटते ये पेड़ों से, बादल घनेरे
ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे
बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये
(दिनेश श्रीनेत के क़लम से)

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