Poet: Saleem Javed

हया पर शायरी

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
अकबर इला आबादी

हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी
ख़ुदा करे कि जवानी तेरी रहे बेदाग़
अल्लामा इक़बाल

इशवा भी है शोख़ी भी तबस्सुम भी हया भी
ज़ालिम में और इक बात है इस सब के सिवा भी
अकबर इला आबादी

इन रस-भरी आँखों में हया खेल रही है
दो ज़हर के पियालों में क़ज़ा खेल रही है
अख़तर शीरानी

जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा
हया यक लख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता
अमीर मीनाई

बर्क़ को अब्र के दामन में छिपा देखा है
हमने इस शोख़ को मजबूरे हया देखा है
हसरत मोहानी

तन्हा वो आएं जाएं ये है शान के ख़िलाफ़
आना हया के साथ है जाना अदा के साथ
जलील मानक पूरी

हया पर शायरी


पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
फिर आइने में चूम लिया अपने आपको
शकेब जलाली

शुक्र पर्दे ही में इस बुत को हया ने रखा
वरना ईमान गया ही था ख़ुदा ने रखा
शेख़ इबराहीम ज़ौक़

ओ वस्ल में मुँह छुपाने वाले
ये भी कोई वक़्त है हया का
हुस्न बरेलवी

कभी हया उन्हें आई कभी ग़रूर आया
हमारे काम में सौ-सौ तरह फ़ुतूर आया
बीख़ोद बद एवनी

हया से हुस्न की क़ीमत दो-चंद होती है
ना हों जो आब तो मोती की आबरू किया है
नामालूम

ग़ैर को या रब वो क्योंकर मना गुस्ताख़ी करे
गर हया भी उसको आती है तो शर्मा जाये है
मिर्ज़ा ग़ालिब

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