नफ़रत पर शायरी

नफ़रत (तास्सुब) पर शायरी

फ़साद, क़तल, तास्सुब, फ़रेब, मक्कारी
सफ़ैद पोशों की बातें हैं क्या बताऊं में
मुजाहिद फ़राज़
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ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाये
बू तास्सुब की हर इक दिल से निकाली जाये
दानिशध अलीगढ़ी
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तास्सुब की फ़िज़ा में ताना-ए-किरदार क्या देता
मुनाफ़िक़ दोस्तों के हाथ में तलवार क्या देता
उनवान चिशती
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सर उठाया जब तास्सुब ने शफ़क़
आदमियत की तबाही आ गई
गोपाल कृष्ण शफ़क़
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है मुंसिफ़ ही गिरफ़्तारे तास्सुब
अदालत में हमारी हार तय है
डाक्टर आज़म

तास्सुब का धुआँ दम घोंटता है
कहाँ मर खप गए रौशन ख्यालो
रुख़शां हाश्मी
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इशक़ इन्सानियत से था उसको
हर तास्सुब से मावरा था फ़िराक़
हबीब जालिब
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नफ़रत (तास्सुब) पर शायरी


जिसमें आती हो बू तास्सुब की
ऐसी तारीख़ क्या करे कोई
कैफ़ अहमद सिद्दीक़ी
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आग दुनिया को ये लगा देगा
जो तास्सुब तिरे बयान में है
साहिर शीवी
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नफ़रत और तास्सुब की इस नगरी में
चाहत का बाज़ार सजा मेरे मौला
साहिल मुनीर
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झुलस रहा है तास्सुब की आग में गुलशन
क़यामतें हैं क़ियामत से पेशतर साक़ी
फ़ारूक़ अर्गली

नफ़रत की तास्सुब की यूं रखी गईं ईंटें
पैदा हुई ज़हनों में दीवार की गुंजाइश
असद रज़ा
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गर यही हाल ज़माने में तास्सुब का रहा
आगे नसलों में मुहब्बत नहीं मिलने वाली
तनवीर गौहर
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जिनके सीने में तास्सुब नहीं पलता कोई
ऐसे लोगों के लिए सारा जहां अच्छा है
सूरज निरावन महर
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नफ़रत (तास्सुब) पर शायरी


नफ़रतें बे-ज़ारियाँ बुग़ज़-ओ-तास्सुब दुश्मनी
ज़िंदगी का बस यही मामूल हो जाये तो फिर
याक़ूब तसव्वुर
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फ़िज़ा में ऐसा तास्सुब का ज़हर फैल गया
ना जाने कितने परिंदों ने पर समेट लिए
शाहिद जमाल

इक तरफ़ तास्सुब है इक तरफ़ रयाकारी
ऐसी बेपनाही में क्या सिक्कों का घर माँगूँ
ज़हीर ग़ाज़ी पूरी
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सबकी दहलीज़ों पे जलते हैं तास्सुब के चिराग़
क्या करेगा कोई ऐसे में हिफ़ाज़त घर की
रहबर जोंपूरी
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जो दिया तास्सुब का तुम जला के आए हो
सुबह तक ना जाने वो कितने घर जला देगा
सागर आज़मी
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मंज़िल ना थी कोई ना ही रस्ता नज़र आता
ये सब उसी तफ़रीक़-ओ-तास्सुब का समर था
हमीदा मुईन रिज़वी
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घर के आँगन में तास्सुब की ये सड़ती हुई लाश
कितने दिन बीत गए अब तो उठा ली जाये
राही शिहाबी

कभी चशमा हटा कर देख आँखों से तास्सुब का
तेरे दामन से उजला मेरा दामन हो भी सकता है
हसीब सोज़
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तास्सुब दरमियाँ से आपको वापिस ना ले आए
हर्म की राह में निकला सनम-ख़ाना तो क्या होगा
सबा अकबराबादी
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ये तास्सुब की फ़ज़ाएँ, ये मुहब्बत का ज़वाल
ये जो दुनिया है जहन्नुम का कोई मर्कज़ है
ज़ीशान साजिद
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जन्म दे नफ़रतों को और तास्सुब को जो फैलाए
सबक़ ऐसा पढ़ाने से ना मैं वाक़िफ़ ना तू वाक़िफ़
जावेद क़मर

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