गरीबी पर शायरी

गरीबी पर शायरी

गरीबी पर शायरी

देव परी के क़िस्से सुनकर
भूके बच्चे सो लेते हैं
अतीक़ इला आबादी

दुनिया में ग़रीबों को दो काम ही आते हैं
खाने के लिए जीना, जीने के लिए खाना
कलीम आजिज़

स्याह बख़ती में कब कोई किसी का साथ देता है
के तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसां से
इमाम बख़श नासिख़

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते ना थे मेले में
क़ैसर अलजाफ़री

फ़रिश्ते आकर उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं
मुनव्वर राना

भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलीयों में गुब्बारे बच्चे
बे-दिल हैदरी

जब चली ठंडी हुआ बच्चा ठिठुर कर रह गया
माँ ने अपने लाल की तख़्ती जला दी रात को
सबुत अली सबा

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको
नज़ीर बाक़िरी

गरीबी पर शायरी

आज फिर माँ मुझे मारेगी बहुत रोने पर
आज फिर गांव में आया है खिलौने वाला
नामालूम

ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ असलम
अपने दरवाज़े को बाहर से मुक़फ़्फ़ल कर के
असलम कोलसरी

जो मेरे गांव के खेतों में भूक उगने लगी
मेरे किसानों ने शहरों में नौकरी कर ली
आरिफ़ शफ़ीक़

वो अक्सर दिन में बच्चों को सुला देती है इस डर से
गली में फिर खिलौने बेचने वाला ना आ जाये
मुहसिन नक़वी

बीच सड़क इक लाश पड़ी थी और ये लिखा था
भूक में ज़हरीली रोटी भी मीठी लगती है
बेकल उत्साही

उसके हाथ में गुब्बारे थे फिर भी बच्चा गुम-सुम था
वो गुब्बारे बेच रहा हो ऐसा भी हो सकता है
सरोश आसफ़

बच्चों की फ़ीस उनकी किताबें क़लम दवात
मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया
मुनव्वर राना

ग़म की दुनिया रहे आबाद शकील
मुफ़लिसी में कोई जागीर तो है
शकील बदायूंनी

गरीबी पर शायरी

अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूँ
जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला
राशिद राही

भूके बच्चों की तसल्ली के लिए
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
नवाज़ देवबंदी

शर्म आती है कि इस शहर में हम हैं कि जहां
ना मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही ना हो
जां निसार अख़तर

खिलौनों की दुकानो रास्ता दो
मरे बच्चे गुज़रना चाहते हैं
नामालूम

ग़रीब-ए-शहर तो फ़ाक़े से मर गया आरिफ़
अमीर-ए-शहर ने हीरे से ख़ुदकुशी कर ली
आरिफ़ शफ़ीक़

हटो कांधे से आँसू पोंछ डालो वो देखो रेल-गाड़ी आ रही है
मैं तुमको छोड़कर हरगिज़ ना जाता ग़रीबी मुझको लेकर जा रही है
नामालूम

मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का एतबार खोती है
वली मुहम्मद वली

खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़लिसी कोई बहाना ढूंढ लेना है
मुनव्वर राना

गरीबी पर शायरी

जुरअत-ए-शौक़ तो क्या कुछ नहीं कहती लेकिन
पांव फैलाने नहीं देती है चादर मुझको
बिस्मिल अज़ीमाबादी

मैं ओझल हो गई माँ की नज़र से
गली में जब कोई बारात आई
नामालूम

मुफ़लिसों की ज़िंदगी का ज़िक्र किया
मुफ़लिसी की मौत भी अच्छी नहीं
रियाज़ ख़ैराबादी

ग़ुर्बत की तेज़ आग पे अक्सर पकाई भूक
ख़ुश हालियों के शहर में क्या कुछ नहीं किया
इक़बाल साजिद

अपनी ग़ुर्बत की कहानी हम सुनाएँ किस तरह
रात फिर बच्चा हमारा रोते-रोते सो गया
इबरत मछलीशहरी

बेज़री फ़ाक़ाकशी मुफ़लिसी बे सामानी
हम फ़क़ीरों के भी हाँ कुछ नहीं और सब कुछ है
नज़ीर अकबराबादी

मैं ज़फ़र ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए
ज़फ़र गोरखपुर

आया है इक राहनुमा के इस्तिक़बाल को इक बच्चा
पेट है ख़ाली आँख में हसरत हाथों में गुलदस्ता है
ग़ुलाम मुहम्मद क़ासिर

गरीबी पर शायरी

जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह
तो मेरे फूल से बच्चों ने मुझको घेर लिया
बिस्मिल साबरी

अब ज़मीनों को बिछाए कि फ़लक को ओढ़े
मुफ़लिसी तो भरी बरसात में बे-घर हुई है
सलीम सिद्दीक़ी

मुफ़लिसी हिस-ए- लताफ़त को मिटा देती है
भूक आदाब के साँचों में नहीं ढल सकती
नामालूम

मुफ़लिसी में मिज़ाज शाहाना
किस मर्ज़ की दवा करे कोई
यगाना चंगेज़ी

हम हुसैन ग़ज़लों से पीट भर नहीं सकते
दौलत-ए-सुख़न लेकर बे फ़राग़ हैं यारो
फ़िज़ा इबन फ़ैज़ी

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