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ग़म पर शायरी

ग़म पर शायरी
ग़म पर शायरी

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएं कैसे
वसीम बरेलवी

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं
जून ईलिया

अब तो ख़ुशी का ग़म है ना ग़म की ख़ुशी मुझे
बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे
शकील बद एवनी

गुम और ख़ुशी में फ़र्क़ ना महसूस हो जहां
मैं दिल को इस मुक़ाम पे लाता चला गया
साहिर लुधियानवी

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है
बशीर बदर

ग़म पर शायरी

ग़म ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लूँ
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
अहमद फ़राज़

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या-रब कई दिए होते
मिर्ज़ा ग़ालिब

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार उससे मैंने बेवफ़ाई की
अहमद फ़राज़

ए ग़म-ए-ज़िंदगी ना हो नाराज़
मुझको आदत है मुस्कुराने की
अबदुलहमीद अदम

उनका ग़म उनका तसव्वुर उनकी याद
कट रही है ज़िंदगी आराम से
मह्शर अनाएती

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी
एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने ना दिया
आज़ाद गुलाटी

क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यों
मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़म पर शायरी

गुम से बिखरा ना पायमाल हुआ
मैं तो ग़म से ही बेमिसाल हुआ
हुस्न नईम

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
फिर उस के बाद गहिरी नींद सोना चाहता हूँ मैं
फ़र्हत एहसास

जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी
जब तेरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़म है ना अब ख़ुशी है ना उम्मीद है ना यास
सबसे नजात पाए ज़माने गुज़र गए
ख़ुमार बारह बंकवी

तुझको पाकर भी ना कम हो सकी बेताबई दिल
इतना आसान तेरे इशक़ का ग़म था ही नहीं
फ़िराक़-गोरखपुरी

मुसीबत और लंबी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
मुज़फ़्फ़र ख़ैराबादी

मुझे ख़बर नहीं गम क्या है और ख़ुशी क्या है
ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है

ग़म पर शायरी

ग़म में कुछ ग़म का मश्ग़ला कीजे
दर्द की दर्द से दवा कीजे
मंज़र लखनवी

ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो ना सके
ये रंज है कि कोई दरमयान में भी ना था
जमाल एहसानी

अरे ओ आसमां वाले बता इस में बुरा किया है
ख़ुशी के चार झोंके गर इधर से भी गुज़र जाएं
साहिर लुधियानवी

उनका ग़म उनका तसव्वुर उनके शिकवे अब कहाँ
अब तो ये बातें भी ए दिल हो गईं आई गई
साहिर लुधियानवी

क्या कहूं किस तरह से जीता हूँ
ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ
मीर असर

हमको किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही
किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही
मसरूर अनवर

ग़म है आवारा ,अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहां मिलते मिलाते रहिए
निदा फ़ाज़ली

ग़म पर शायरी

जमा हमने किया है ग़म दिल में
इस का अब सूद खाए जाऐंगे
जून ईलिया

मेरी ज़िंदगी पे ना मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं
जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ां बहार से कम नहीं
शकील बदायूंनी

दर्द-ओ-ग़म दिल की तबीयत बन गए
अब यहां आराम ही आराम है
जिगर मुरादाबादी

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तसकीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है
दिवाकर राही

इक इशक़ का ग़म आफ़त और उसपे ये दिल-ए-आफ़त
या ग़म ना दिया होता या दल ना दिया होता
चिराग़ हसन हसरत

अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुरनम से सँभाले ना गए
ये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले ना गए
मीर अनीस

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी कायनात गई
जिगर मुरादाबादी

ग़म पर शायरी

ग़म की दुनिया रहे आबाद शकील
मुफ़लिसी में कोई जागीर तो है
शकील बद एवनी

ज़िंदगी दी हिसाब से उसने
और ग़म बे-हिसाब लिखा है
एजाज़ अंसारी

सुकून दे ना सकें राहतें ज़माने की
जो नींद आई तेरे ग़म की छाओं में आई
पयाम फ़तहपोरी

इक-इक क़दम पे रखी है यूं ज़िंदगी की लाज
ग़म का भी एहतिराम किया है ख़ुशी के साथ
कैफ़ी बिलग्रामी

इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था
के इशक़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी

ग़म -ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग ईलाज
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक
मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते
क्यों बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते
रियाज़ ख़ैराबादी

ग़म पर शायरी

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छिपा रहे हो
कैफ़ी आज़मी

भूले-बिसरे हुए ग़म फिर उभर आते हैं कई
आईना देखें तो चेहरे नज़र आते हैं कई
फज़ील जाफ़री

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से
कैसी तन्हाई टपकती है दर-ओ-दीवार से
अकबर हैदराबादी

मुसर्रत ज़िंदगी का दूसरा नाम
मुसर्रत की तमन्ना मुस्तक़िल ग़म
जिगर मुरादाबादी

थी तितलीयों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी
वो शहर किया हुआ जिसकी थी हर गली मेरी
अख़तर होशयार पूरी

हज़ार तरह के थे रंज पिछले मौसम में
पर इतना था कि कोई साथ रोने वाला था
जमाल एहसानी

ऐश ही ऐश है ना सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
अली जव्वाद ज़ैदी

लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़श दी उसने
हौसले भी अदम दिए होते
अबदुलहमीद अदम

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