ईद पर शायरी

ईद पर शायरी

ईद का चांद तुमने देख लिया
चांद की ईद हो गई होगी

दिन-भर ख़फ़ा थी मुझसे मगर चाँद-रात को
मेहंदी से मेरा नाम लिखा उसने हाथ पर

मेरी आरज़ूओं की तमहीद तुम हो
मेरा चांद तुम हो मेरी ईद तुम हो

गुम के मारों के लिए दर्द का सामान बना
शाम की गोद में वो शोला नुमा ईद का चांद

चांद को देखा तो याद आ गई सूरत तेरी
हाथ उठे हैं मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं

अल्लाह करे कि तुमको मुबारक हो रोज़-ए-ईद
हर राहत-ओ-निशात का सामाँ लिए हुए

नज़र जो चांद पे की दिल में मुस्कुराए तुम
दुआ को हाथ उठाए तो याद आए तुम

कितने तरसे हुए हैं ईदों को
वो जो ईदों की बात करते हैं

ईद पर शायरी

जिनके मिलने का आसरा ही नहीं
ईद उनका ख़्याल लाती है

मेरे क़रीब आई ना अब तक बहार ईद
मुद्दत से है जहां में मुझे इंतिज़ार ईद

मुझको तेरी ना तुझे मेरी ख़बर जाएगी
ईद अब के भी दबे-पाँव गुज़र जाएगी

ना जाने मेरा तसव्वुर था या फ़रेब-ए-नज़र
हिलाल-ए-ईद में भी तुम मुझे नज़र आए

वफ़ा का संदेश लेकर उतरे तुम्हारे आँगन में
गवाह रफ़ाक़तों का मोहब्बतों का बन कर हिलाल-ए-ईद

कितनी मुश्किल से फ़लक पर ये नज़र आता है
ईद के चांद ने भी अंदाज़ तुम्हारे सीखे

एक लम्हे को कभी मैंने तुझे देखा था
उम्र-भर मेरी नज़र में ना जचा ईद का चांद

ईद पर शायरी

ख़ुद तो आते नहीं याद चली आती है
ईद के रोज़ मुझे यूं ना सताए कोई

हिलाल-ए-ईद भी निकला था वो भी आए थे
मगर उन्ही की तरफ़ थी नज़र ज़माने की

मज़ा बहारे कुहन का चखा ही जाती है
हम अहल हों कि ना हों ईद आ ही जाती है

जब तू नहीं तो ईद में रंग-ए-वफ़ा नहीं
सब क़िस्मतों के खेल हैं तुझसे गिला नहीं

पलकों पे हसरतों के सितारे सजा लिए
इस धज से ख़्वाहिशों ने किया एहतिमामे ईद

आव मिलकर मांगें दुआएं हम ईद के दिन
बाक़ी रहे ना कोई भी ग़म ईद के दिन
हर आँगन में ख़ुशीयों भरा सूरज उतरे
और चमकता रहे हर आँगन ईद के दिन

नज़म


आज चाँद रात है
और मैं अपने हाथों में
देखते हुए सोच रहा हूँ
कि ये ईद किस के नाम करूँ
उसके नाम।
जो दिल की धड़कनों में है
या फिर उसके नाम
जो हाथों की लकीरों में‌ है

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