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कथाकार सूरज प्रकाश से डाक्टर मेनका त्रिपाठी की बातचीत

सूरज प्रकाश
सूरज प्रकाश
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मेनका त्रिपाठी – महिला पात्रों का इतनी बारीकी से मनोवैज्ञानिक चित्रण कैसे कर पाते हैं आप ?हैरानी होती है।  

सूरज प्रकाश- पहली बात तो यही है कि मैं किसी भी पात्र को अपनी रचना में तब तक नहीं लेता जब तक मैं उस पात्र में पूरी तरह से नहीं उतर जाऊं और वह पात्र मुझमें  पूरी तरह से उतर न जाए।  चाहे रचना लघुकथा ही क्यों ना हो। मैं अपने सभी पात्रों के बारे में गहरा अध्ययन करता हूं, तभी वे मेरी रचनाओं में आते हैं। इसी कारण से मेरे पात्र विश्वसनीय, इसी दुनिया के और अपने से लगते हैं चाहे वे पूरी तरह से काल्पनिक हों या कल्पना का सहारा लेकर रचे गए हों। 

जहां तक महिला पात्र रचने व उनके मनोविज्ञान को सामने रखने की बात है तो इसमें तीन चीजों ने मेरी बहुत मदद की है। मेरा बचपन जिस मौहल्ले में बीता  वह गरीबों का मोहल्ला था और हम लोग सारी तकलीफों के बावजूद मिलजुल कर रहते थे। झगड़े होते थे लेकिन फिर भी सब एक दूसरे के काम आते थे और शायद ही कभी ऐसा हो कि किसी घर में कोई बच्चा भूखा सो जाए। मैंने पूरे बचपन में अपने घर की महिलाओं को, मां को, बहनों को और दूसरी परिचित औरतों को हमेशा संघर्ष करके और कुछ राह निकालते हुए देखा है। इन सब चीजों को मैंने बहुत नजदीकी से और गहराई से देखा और महसूस किया है। दूसरी बात यह रही कि मैं रिजर्व बैंक में लगभग पूरी जिंदगी नौकरी करता रहा और अधिकांश वक्त मैंने मुंबई जैसे महानगर में गुजारा। यहां का जीवन और खास तौर पर कामकाजी महिलाओं का जीवन अतिरिक्त संघर्ष की मांग करता है। हमारे बैंक में लंच में हमारी मेज पर हमारे साथ हमेशा  तीन चार महिलाएं बैठी होती थीं। वे तब आपस में घर द्वार की, नौकरी की, बच्चों की, पति की, अपनी महत्वाकांक्षाओं की और छोटे मोटे सुखों की बातें करती थीं। ये सारी बातें  जाने अनजाने मुझ तक पहुंचती रही और मुझे प्रभाववित करती रहीं। मैं इन सारी बातों से उनके जीवन के बारे  में, मनोविज्ञान के बारे में और उनकी अधूरी हसरतों में जानता रहा, सीखता रहा और अपने आप को अमीर बनाता रहा। तीसरी  बात यह रही कि पिछले दस बरस का मेरा लेखन फेसबुक के चरित्रों को लेकर हुआ है। मेरी 6 लंबी कहानियां  और दो उपन्यासों के महिला पात्र फेसबुक से आए हैं। फेसबुक महिला मनोविज्ञान को समझने का बहुत बड़ा स्कूल है। फेसबुक बेशक आभासी है लेकिन उसके पीछे के चेहरे असली और इसी जमीन के होते हैं। उनके संघर्ष, उनकी महत्वाकांक्षाएं, उनकी हसरतें और उनके जद्दोजहद असली होते हैं। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे फेसबुक पर पाठिकाओं और मित्रों के रूप में बहुत सारी महिलाएं मिलीं और उन्होंने मुझ पर विश्वास करके अपनी निजी बातें बिना किसी रोक-टोक के मुझसे शेयर कीं और इस तरह से मुझे हर तरह के जीवन में झांकने का बेहतरीन अवसर मिला। कई महिला मित्र तो मुझसे ऐसी बातें भी शेयर करती थीं जो शायद उनके पति भी नहीं जानते होंगे।

तो कुल मिलाकर मैं मानता हूं कि किसी भी लेखक के लिए नज़र और नज़रिया महत्वपूर्ण होते हैं। नज़र खुली और नज़रिया पाजिटिव हो। ये सारी बातें मुझे महिलाओं को समझने और उनके बारे में लिखने में मदद करती रहीं। लेखक आसपास अपने जीवन को जितना देखेगा, समझेगा, उतना ही प्रमाणिक और ईमानदार रचना करेगा।

मेनका त्रिपाठी-अपने बचपन की कोई ऐसी घटना जिसने जीवन को कोई दिशा दी है तो बताएं

सूरज प्रकाश-बचपन में बारह तेरह बरस की उम्र्र में पहली और आखिरी बार क्रिकेट खेलते हुए मेरा सामने का एक दांत टूट गया था जिसकी वजह से मैं बहुत देर तक, कई वर्षों तक हीन भावना से ग्रस्त रहा। मुझ में इतनी अधिक हीनता की भावना आ गई थी कि मैं मुंह पर हाथ रख कर बात करता था और कभी किसी से आत्मविश्वास के साथ बात नहीं कर सकता था। मेरा एक हाथ हमेशा मुंह के आगे रहता था। इस घटना ने मुझे अकेला और अकेला करना शुरू कर दिया था। उसी दौर में मैंने  कविता के रूप में तुकबंदी शुरू की थी। बेशक यह कविता के कोई मानदंड पूरे नहीं करती थी लेकिन मन की बात कहने का एक जरिया मुझे मिल गया था। 13 बरस से कविता के जरिए शुरू किया गया सफर लगभग 22 बरस बाद कहानी के रूप में आगे बढ़ा। तब से मैंने गद्य ही लिखा है और कविताओं से लगभग दूरी बनती चली गई है। अभी लिखते हुए लगभग पैंतीस बरस बीत गए हैं लेकिन लेखन की यात्रा भी आसान नहीं रही है। बीच-बीच में दो दो चार चार बरस के और कई बार उससे भी लंबे ऐसे समय आए हैं कि मैं एक भी कहानी नहीं लिख पाया। 2004 के बाद सबसे लंबा ब्लॉक सात बरस का रहा। तब मैंने 2011 में मैंने एक कहानी  लिखी थी। उसके बाद भी बीच-बीच में राइटर्स ब्लॉक आते रहे और लिखना छूटता रहा।  2015 में लहरों की बांसुरी लिखने के बाद 2018 में अगली कहानी लिख पाया था। 

कहानी लिखना भी दिल्ली में नौकरी के सिलसिले में एक साथी के साथ हुए हादसे के बाद शुरू हुआ था। यह घटना 1980 की थी और मैंने इस पर 1984 में एक लघुकथा लिखी थी जो सारिका के सर्व भाषा लघुकथा प्रतियोगिता में एक हजार लघुकथाओं में पहले स्थान पर चुनी गई थी। मैं अपने लेखन की शुरुआत इसी लघुकथा से मानता हूं। बेशक अपनी पहली कहानी इस लघुकथा के तीन बरस बाद लिख पाया था।

मेनका त्रिपाठी- उत्कृष्ट सृजन के मूल में कोई गहरी पीड़ा छिपी हुई होती है क्या? ऐसी किसी रचना के विषय में आप उल्लेख करेंगे।

सूरज प्रकाश- सृजन के  पीछे हर बार कोई पीड़ा, कोई अवसाद, कोई तकलीफ या कोई ऐसी भावना छुपी होती है कि जब तक हम उसे किसी  रचना के रूप में अभिव्यक्त न कर लें, वह पीछा नहीं छोड़ती। रचना बेशक उत्कृष्ट न बन पाए, पीड़ा सच्ची होती है और कई बार वह तब तक आप को बेचैन किए रहती है जब तक आप लिख कर मुक्ति न पा लें। कई लोग इस पीड़ा को, रचे जाने की पीड़ा की प्रसव की पीड़ा से तुलना करते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। प्रसव पीड़ा आमतौर पर एक समय सीमा के भीतर, 9 महीने की रहती है। कभी एकाध हफ्ता उधर या उधर। और फिर प्रसव के अंतिम पलों को छोड़कर आम तौर पर प्रसूता एक आनंद की स्थिति में रहती है। लेकिन लेखन के साथ यह नहीं होता। रचना कागज में उतरने में एक दिन भी ले सकती है और बरसों बरस भी और रचने की पीड़ा लगातार लेखक को बेचैन किये रहती है। 

अपनी कहूं तो मेरी कई रचनाओं ने लिखे जाने के लिए बहुत लंबा समय लिया है। मुझे कई कहानियों के पात्रों और घटनाओं ने लंबे समय तक परेशान किया है। उर्फ़ चंद्रकला कहानी ने 17 बरस, देस बिराना उपन्यास ने सोलह बरस, बाबू भाई पंड्या कहानी ने 10 बरस, मर्द नहीं रोते कहानी ने 12 बरस, यह हत्या का मामला है कहानी ने 6 बरस लिए हैं। इसी तरह से हर कहानी ने रचे जाने के लिए भरपूर समय लिया है और इस पूरे समय में मुझे  बेचैन किए रखा है।

एक और बात है कि रचनाओं के पात्र तब तक हमारा पीछा नहीं छोड़ते, हमें मुक्त नहीं करते जब तक वे लिखे जा कर अपने मनमाफिक रूप में पाठकों तक पहुंचा नहीं दिए जाते। 

यह भी है कि जिस तरह की पीड़ा लेखक को किसी पात्र को रचने में होती है कई बार पाठक भी वह रचना पढ़ कर  उसी तकलीफ को और उसी बेचैनी को महसूस करता है। यही लेखन की सफलता है कि आप के पात्र ने पहले आपको और फिर आपके पाठक को कितना बेचैन किया है। 

मेरी पहली कहानी अल्बर्ट रेडियो के लिए चार मिनट की रिकार्डिंग के लिए 1984 में लिखी गयी थी। मैं उसे उपन्यास का रूप देना चाहता था। सैकड़ों पन्ने लिखे रखे हैं लेकिन उस पात्र का कद इतना बड़ा होता रहा कि मैं आज तक उस उपन्यास को पूरा करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाया हूं।

मेनका त्रिपाठी- 25 बरस पहले की कहानियों में महिलाओं की जीवन में और आज की कहानियों के महिलाओं के जीवन में क्या फर्क पाते हैं? 

  सूरज प्रकाश- 25 बरस पहले की महिलाओं की कहानियों में और आज की कहानियों में महिलाओं में उतना ही फर्क है जितना उनके वास्तविक जीवन में फर्क आया है। 

पहले साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता था। आज दर्पण की यही भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है। बेशक सोशल मीडिया पुरुष और महिलाओं दोनों के जीवन में बहुत क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आया है लेकिन इस आजादी का ज्यादा फायदा महिलाओं को मिला है। महिलाएं अब ज्यादा मुखर होकर, ज्यादा आत्मविश्वास के साथ और ज्यादा भरोसे के साथ अपनी बात कह पा रही हैं।। उसे घर बैठे अभिव्यक्ति के ढेर सारे माध्यम मिल गए हैं। तब वह स्वयं के बलबूते पर अनजान और अजनबी पुरुष मित्र बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी और आज उसे सामने ऐसा कोई बंधन नहीं है। उसके सामने सोशल मीडिया ने नई दुनिया खोल दी है जहां वह अपनी बात कह  रही है, दूसरों की बात सुन रही है और अपनी मौजूदगी को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस भी  करा रही है। सोशल मीडिया ने उसकी दबी छुपी अभिव्यक्ति को सामने रखने का एक बहुत बड़़ा माध्यम दिया है। कभी भी किसी भी काल में एक ही वक्त में इतनी महिलाएं रचनारत नहीं थीं। यहां रचना की श्रेष्ठता की बात नहीं कर रहे, बल्कि खुद को अभिव्यक्त कर पाने की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सोशल मीडिया की मौजूदगी आज की कहानियों में साफ तौर पर देखी जा सकती है और महसूस की जा सकती है। बेशक सरकारी योजनाओं और सोशल मीडिया की मौजूदगी में औरत के सामने अभिव्यक्ति के बाद सारे माध्यम खोले हैं लेकिन यह बेहद दुखद है कि आज भी बलात्कार की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। पुरुष यह स्वीकार नहीं कर पा रहा कि औरत उसके देखते-देखते उससे आगे बढ़ रही है या उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगी है। वह अभी भी यह दावा करता है कि औरत की जो भी जगह है उसी की वजह से है। 

अभी भी ऐसे मौके देखने में आ जाते हैं कि पत्नी के नाम पर चुनाव लड़कर पति उसकी जगह पर अपनी हैसियत बनाए रखते हैं या पत्नी के फेसबुक एकाउंट में ताक झांक करते हैं या महिलाओं को पति या परिवार के डर से नकली नाम और पहचान के साथ अपना फेसबुक खाता चलाना पड़ता है लेकिन ये घटनाएं गिनी चुनी हैं। आज की महिला ज्यादा जागरूक, सजग और सचेत है और पुरुष वर्ग को यह बात स्वीकार करने में तकलीफ हो रही है। 

जहां तक मेरी कहानी में आयी महिलाओं का सवाल है, वहां पर भी मैं यह परिवर्तन देख पा रहा हूं और उससे बच नहीं पाया हूं। मेरी 25 बरस पहले की कहानियों की महिलाएं आमतौर पर घरेलू महिलाएं थी और घर की चारदीवारी के अंदर बंद थीं और अपनी आवाज उठाने में भी झिझक महसूस करती थीं। यहां तक कि सामने आ कर अपनी बात नहीं कह पाती थीं, लेकिन आज की मेरी महिला पात्र न केवल दबंग हैं, अपनी बात कहने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं बल्कि पुरुष मित्रों के साथ बैठकर शराब और सिगरेट का सेवन भी करती हैं। 25 बरस पहले मैंने पत्थर दिल कहानी लिखी थी जिस की नायिका पति के सामने बेचारगी महसूस करती है लेकिन कह नहीं पाती। मेरी इधर की सभी कहानियों के महिला पात्र आम तौर पर सोशल मीडिया से आए हैं और उन्हें एडवांस पात्र माना जा सकता है। इतना कि लहरों की बांसुरी की नायिका अपने फेसबुक मित्र के साथ एक रिजॉर्ट में 3 दिन अकेले बिताने की हिम्मत कर सकती है। लघु उपन्यास ख्वाबगाह उपन्यास की नायिका पति के होते हुए मित्र के साथ दूसरा हनीमून मनाने की बात पर दूसरी बार नहीं सोचती और उसे इस संबंध पर कोई मलाल भी नहीं होता। ये सारे बदलाव हमारे वक्त के गवाह हैं।

एक छोटा सा उदाहरण देना काफी होगा। पच्चीस बरस पहले एक विज्ञापन आता था कि बाहरी संबंधों से बचें। अब विज्ञापन आता है कि ऐसे संबंधों में सुरक्षा बरतें।

मेनका त्रिपाठी- आपके अनुसार लेखक होने की अनिवार्य शर्त क्या है?

सूरज प्रकाश- किसी भी कला के लिए चाहे वह लेखन हो, नृत्य हो, गायन हो या चित्रकला, कलाकार के भीतर एक नैसर्गिक प्रतिभा होती है और वह उसे निरंतर अभ्यास के जरिए और विकसित करता है। लेखक होने के लिए भी पहली और आखिरी शर्त लेखन क्षमता ही होती है और उसे वह नियमित लेखन से, अध्ययन से, चिंतन से विकसित कर सकता है। कहा जाता है कि एक पन्ना लिखने से पहले लेखक में सौ पन्ने पढ़ने का धैर्य होना चाहिए। उसकी निगाह पैनी हो, उसका नज़रिया पॉजिटिव हो और अनुभव का व्यापक संसार हो। ये बातें उसकी मदद करती हैं। उसका संवेदनशील होना जरूरी है। 

मैं एक बात और भी मानता हूं कि लेखक में परकाया प्रवेश का गुण होना चाहिए। जब तक वह अपने चरित्र के भीतर उतरकर उससे एकाकार नहीं होता, उसे ईमानदारी से अपने लेखन में नहीं ला सकता और दूसरी तरफ उसमें यह क्षमता भी होनी चाहिए कि उसने जो पात्र रचा है लिखे  जाने के बाद में वह पाठक को भी उतना ही उद्वेलित करे जितना लिखते समय वह खुद उद्वेलित हुआ था।

ये कुछ बातें हैं जो लेखक को लेखक बनाती हैं। बेशक अभ्यास है, अध्ययन से और चिंतन करके लेखकीय क्षमता को विकसित किया जाता है लेकिन पहली बात तो यही है कि व्यक्ति में लेखकीय क्षमता होनी चाहिए। 

बाद में एक ऐसा वक्त आता है कि शब्द और विचार खुद-ब-खुद आते चलते हैं और उसके लिए अलग से मेहनत नहीं करनी पड़ती। लेकिन मैंने ऐसे भी कवि देखे हैं जो कभी भी मांग पर तत्काल कविता की आपूर्ति कर सकते हैं। अभी कुछ दिन पहले मैं एक कवयित्री का कविता संग्रह भूमिका लिखने के लिए देख रहा था। मैंने उसे बताया कि संख्या के हिसाब से कम से कम चार कविताएं और चाहिए। उसने कहा कि कोई बात नहीं, वह दो घंटे में भेज देगी और उसने 2 घंटे में चार कविताएं लिखकर भेज दी थीं। 

आप समझ सकते हैं कि उन कविताओं का स्तर कैसा रहा होगा और कविताओं की उम्र कितनी देर की रही होगी। लिखना धैर्य और लगन मांगता है।

मेनका त्रिपाठी- अभी बहुत कुछ है जो आप अब तक नहीं लिख पाए, उसके बारे में आप क्या सोचते हैं?

   सूरज प्रकाश- बेशक हम अपनी हर रचना के साथ अपने आप को पूरी तरह से खाली कर देते हैं लेकिन फिर भी ऐसा बहुत कुछ है जो अनकहा रह जाता है। लेखक हर बार अपने आप को पूरी तरह से खाली करने के बाद भी खाली नहीं कर पाता। हर रचना उसका नया जन्म होती है। 

मैंने अपनी सबसे पहली कहानी  अल्बर्ट रेडियो पर चार मिनट की रिकॉर्डिंग के लिए लिखी थी। कहानी  एक ऐसे खिलाड़ी के बारे में थी जो शराब के चक्कर में  घर बार, नौकरी सबसे बेपरवाह हो जाता है और अच्छी नौकरी होने के बावजूद फटेहाल रहता है। 

मैंने  ऐसे शराबियों को लेकर, जो आत्महंता हो जाते हैं और जीवन से विमुख हो जाते हैं, पर एक पूरा उपन्यास लिखने के बारे में सोचा। मैंने ऐसे बहुत से शराबी देखे थे जो इस तरह के चरित्र के लिए थे, मेरे उपन्यास के लिए कच्चा माल उपलब्ध करा सकते थे लेकिन 25 बरस तक सैकड़ों पन्ने लिखे जाने के बाद भी उपन्यास नहीं लिखा जा सका क्योंकि हर बार मेरे पात्र का कद इतना बड़ा हो जाता था कि वह मेरे शब्दों में समा ही नहीं सकता था। अल्बर्ट कहानी 25 साल बाद छपी थी और उस पर उपन्यास अभी भी लिखा जाना बाकी है। 

एक और उपन्यास अधूरा पड़ा हुआ है। हैदराबाद में मेरी एक मित्र थी जो मेरे साथ पढ़ती थी। मुझसे शादी करना चाहती थी। नहीं हो पायी। उसने जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखे। उसने  दो विवाह किए लेकिन दोनों विवाह सफल नहीं हुए और वह अकेली की अकेली रह गयी। उसके बाद के जीवन पर एक उपन्यास शुरू किया था लेकिन आगे नहीं बढ़ पाया। 

भविष्य में अभी क्या छुपा हुआ है, पता नहीं। 

आत्मकथा लिखने के बारे में सोचा नहीं था लेकिन हाल में मेरे छोटे भाई विजय ने मेरी जीवनी उम्र भर देखा किए लिख कर इस कमी को पूरा कर दिया है। वैसे मेरा जीवन ऐसा आदर्श जीवन नहीं है जो किसी को प्रेरणा दे सके। मैंने जो तकलीफें भोगी हैं उससे  ज्यादा तकलीफें सब लोग भोगते हैं और मुझसे ज्यादा सफल भी होते हैं।

मेनका त्रिपाठी- लेखक बनना कब तय हुआ?

सूरज प्रकाश- मेनका जी, यह तय थोड़े ही करना होता है कि लेखक बनना है और कब बनना है। बस लेखक बनना होता है और बन जाते हैं। कोई लेखक कम लिखते हैं, कोई ज्यादा लिखते हैं, कोई बहुत ज्यादा लिखते हैं और कोई पूरी जिंदगी झटपटाते रहते हैं और लिखा नहीं जाता। लेखक बनने की हसरत कभी पूरी नहीं हो पाती। एक बात और है या तो लेखन होता है या नहीं होता। अच्छा या बुरा लेखन नहीं होता। 

अपनी ही बात करूं तो मैं 13 बरस की उम्र में कविताएं शुरू करने के बाद चौंतीस पैंतीस बरस की उम्र तक कहानी नहीं लिख पा रहा था जबकि छटपटाता रहता था लिखने के लिए। यह छटपटाहट इतनी ज्यादा थी कि कहीं चैन नहीं मिलता था।

बस, मेनका जी, लेखक बनना हमारे हिस्से में लिखा होता है और हम लेखक हो जाते हैं। 

मेनका त्रिपाठी- आप निरन्तर सृजन कार्य कर रहे हैं। इतने दिनों बाद आप अपनी मेहनत को किस सिरे पर देखते हैं?

सूरज प्रकाश- महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मैं इतने बरस के बाद, लिखना शुरू करने के लगभग तीस बत्तीस बरस बाद अपने आप को कहां देखता हूं। महत्वपूर्ण यह है कि मेरे समकालीन, मेरे बाद के लेखक और मेरे पाठक, संपादक और आलोचक मुझे किस तरह से देखते हैं। लेखन में हमेशा बहुत सारे लोग एक साथ काम कर रहे होते हैं और उनमें से बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो अपने वर्तमान से, अपनी भाषा से आगे निकल पाते हैं। बहुत सारे लेखक ऐसे भी होते हैं कि वे अपने जीते जी अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं या बहुत कम दायरे में पहचान बना पाते हैं। सही मान्यता का सुख सबके हिस्से में नहीं लिखा होता।

इसमें कोई शक नहीं कि मेरे साथ पाठकों का एक बड़ा वर्ग है जो मेरे लेखन को पसंद करता है और खोज कर मेरी रचनाएँ पढ़ता है, पत्र पत्रिकाओं में छपने पर प्रतिक्रिया भी देता है लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ है कि आलोचकों या वरिष्ठ लेखकों ने या समकालीन लेखकों ने कभी मेरा लिखा पढ़ा होगा या उस पर कोई टिप्पणी की हो। 

मैं कभी किसी खेमे में नहीं रहा। किसी खास संप्रदाय में नहीं रहा। मैं आमतौर पर सेमिनारों में नहीं बुलाया जाता और ना ही अपनी किताबों की समीक्षा करवाने के लिए किताबें भेजता हूं और न ही लेखकों को अपनी किताबें भेंट करता हूं। मुफ्त की या इस तरह से भेजी गई किताबें कितनी पढ़ी जाती हैं मैं जानता हूं। 

कुल मिलाकर मैं पाठकों का लेखक हूं और इसमें मुझे संतोष है। 

मैं नहीं जानता कि जो दंद फंद करके, जुगाड़ करके थोड़ी बहुत जगह बना भी लेते हैं उन्हें भी कितने लोग बाद में याद रखेंगे। 

यह भी है कि किसी लेखक को बनाने या ना बनाने के पीछे संपादकों, प्रकाशकों और समीक्षकों का बड़ा हाथ होता है और कई बार अच्छा लिखने वाले लेखक भी सामने नहीं आ पाते। इसमें कोई शक नहीं कि  लेखक दमदार होगा तो उसकी पहचान बनेगी। मैंने कभी कहा था कि अच्छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होती। पाठक अच्छी किताबें खोज लेते हैं। 

अपने बारे में यही कहूंगा कि जो लिखा है बहुत अच्छा नहीं तो बहुत खराब भी नहीं है। मेरा लिखा पढ़ा जाता है। यही मेरे लिए काफी है। 

मेनका त्रिपाठी- अपने लेखन और निजी जिंदगी में किस तरह संतुलन बनाते हैं ? या आपका लिखना, आपकी ज़िंदगी को किस तरह प्रभावित करता है ?

 सूरज प्रकाश- जब आप लेखन में और जिंदगी में ईमानदार हों, मेहनती हों, अपना काम जुनून के साथ करते हों तो संतुलन बनाने में कोई तकलीफ नहीं होती। कह ही चुका हूं कि लेखक की पूंजी उसके अनुभव, उसका नज़रिया और उसकी पॉजिटिव सोच होती हैं और यही मेरे जीवन में भरपूर रहे और मुझे लेखक में इनका पूरा फायदा मिलता रहा। जिस तरह का अनुशासित जीवन मैं जीता हूं, लेखन में भी उसी तरह से काम करता हूं। बी डिफरेंट मेरे जीवन का उसूल है और लेखन में भी मैंने इसी उसूल को अपनाया है। मेरे पात्र थोड़े अलग हैं और पाठकों से सीधा संबंध कायम करने में सफल हो जाते हैं। दूसरी तरफ, लेखन ने मेरे जीवन को समृद्ध किया है। मेरे अनुभव में, मेरी सोच में और मेरे मित्रों के दायरे में बहुत बड़ी वृद्धि की है। फेसबुक ने मुझे पाठकों का, मित्रों का, रचनाओं के पात्रों का एक बहुत बड़ा परिवार दिया है जो मेरे लेखन के अलावा मेरे सुख दुख में भी रुचि रखता है। इस बात को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि pratilipi.com नाम की पत्रिका ने मुझे 470000 पाठक दिए हैं और वे प्रतिदिन किसी न किसी कहानी पर अपनी राय देते ही हैं। लेखन के बिना इतने बड़े पाठक और मित्र वर्ग से जोड़ना बिल्कुल भी संभव नहीं था। 

मेनका त्रिपाठी- क्या आप पहले से ढांचा बनाकर लिखते हैं या स्वतःस्फूर्त ढंग से लिखते जाते हैं ?

सूरज प्रकाश- नहीं, मैं कोई ढांचा बनाकर नहीं लिखता न ही रचना लिखने से पहले  कहानी या रचना का कोई ढांचा ही मेरे सामने होता है। बस, इतना होता है कि कोई पात्र या कोई घटना या कोई प्रसंग जब डिस्टर्ब करता है, तो मेरा पूरा ध्यान उसी पर रहता है और मैं लगातार कई कई दिन तक उस पात्र की गिरफ्त में रहता हूं। एक ऐसा मौका आता है कि और नहीं रहा जाता और कहानी लिखना शुरू हो जाता है। मैं कोई भी रचना किस्तों में लिखता हूं और उतना ही लिखता हूं जितना उस दिन मैंने पिछले दिन की कहानी से आगे का सोचा होता है। मुझे नहीं पता होता कि यह रचना अंत में जाकर क्या रूप लेगी। यह काम रचना खुद ही करती है कि वह मुझे कहानी के अंत तक पहुंचाती है। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक कहानी पूरी ना हो जाए। इसमें 10 दिन भी लग सकते हैं, 20 दिन में लग सकते हैं और दो-तीन महीने भी लग सकते हैं। एक कहानी लिखते समय मैं किसी और रचना के बारे में या किसी और पात्र के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

मेनका त्रिपाठी- आपके लेखन की मूल प्रेरणा क्या है ?

सूरज प्रकाश- लेखक के लिए लेखन के अलावा लेखन की मूल प्रेरणा क्या हो सकती है। कोई संदर्भ, कोई प्रसंग, कोई बात, व्यक्ति, कोई घटना दिल को डिस्टर्ब करती है तो वह धीरे-धीरे एक रचना का आकार लेने लगती है। जरूरी नहीं कि यह काम उस घटना से या पात्र से  रूबरू होने के तुरंत बाद ही हो जाए। इसमें भी बरसों लग जाते हैं। कई बार कहानी लिखने में मुझे 10 से 15 साल भी लगे हैं। एक छोटी सी घटना बताता हूं 2012 में मैं बैंक की एक रिटायरमेंट ट्रेनिंग में था। वहां पर एक सेशन में हमें किस्सा बताया गया कि किस तरह से एक कर्नल ने अपनी जायदाद जीते जी अपने बेटे को सौंप दी। अचानक बेटे की मृत्यु हो गई और बहू ने उसे एक तरह कर्नल को घर के आउटहाउस में शिफ्ट कर दिया। बाद में उस कर्नल की डिप्रेशन के कारण मृत्यु हो गई थी।  यह घटना लगातार 6 बरस तक मेरे दिलो दिमाग पर छायी रही। 2018 के आसपास घर के पास एक पार्क में एक ऐसे ही व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई जो लगभग कर्नल की तरह का जीवन जी रहा था और वह बेहद उदास रहा करता था। दोनों के जीवन की घटना कॉमन थी कि दोनों ने जीते जी अपनी संपत्ति बेटे को सौंप चुके थे और खाली हाे चुके थे।2018 में मैंने अपनी कहानी यह हत्या का मामला है लिखी थी। दोनों के जीवन की घटनाएं जुड़ कर इस कहानी में सामने आयी थीं।  कहानी पढ़कर आप बिल्कुल भी अंदाजा नहीं लगा सकते कि यह एक व्यक्ति की नहीं दो व्यक्तियों की कहानी है।

मेनका त्रिपाठी- आपके पात्र कहाँ आते हैं ? काल्पनिक हैं या आसपास के माहौल से ढूंढते हैं ?

सूरज प्रकाश- कहानियों या रचनाओं के पात्र कहीं से ढूंढ कर नहीं लाए जा सकते और ना ही उन्हें इस तरह से कहानी में जगह दी जा सकती है। पात्र हमारे आसपास बिखरे होते हैं और अपनी कहानी खुद बयान कर रहे होते हैं। बस निगाह चाहिये। जब आप कहानी लिखना शुरू करते हैं तो पात्र अपनी कहानी खुद ही बयान करना शुरू कर देते हैं और हमें कोई भी अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। हां, यह जरूर होता है कि कई बार जीवन में मिले नेगेटिव पात्र रचना में आकर पॉजिटिव हो जाते हैं और पॉजिटिव पात्र ना चाहते हुए भी नेगेटिव बन जाते हैं। एक बात और होती है कि कई बार हमें एक ही पात्र को गढ़ने के लिए कई पात्रों के जीवन की घटनाएं उस एक पात्र में लानी होती हैं और हमें खुद भी नहीं पता चलता कि यह कैसे हो गया। मेरी एक छोटी सी कहानी है दो जीवन समांतर। आठ आठ पेज की इस कहानी में कुल 7 घटनाओं का जिक्र है और यह सातों घटनाएं अलग-अलग व्यक्तियों के जीवन से आयी हैं। मेरी एक कहानी है कही अनकही। ये एक अकेली लड़की की कहानी है और उसमें 20 से अधिक व्यक्तियों की घटनाओं का समावेश है। मेरी चर्चित कहानी लहरों की बांसुरी जिसे अब तक सवा लाख से अधिक पाठक पढ़ चुके हैं, इस कहानी की नायिका तीन महिलाओं के जीवन की घटनाओं की ब्लैंडिंग करके बनी  है। 

किसी भी पात्र को रचने के लिए सही मात्रा में सच और कल्पना की ब्लेंडिंग करनी ही होती है। कहानी में कहानीपन लाने के लिए ये करना ही होता है। उसके बेशक कुछ पात्र हूबहू जिंदगी से जस के  तस आ जाते हैं। कई बार पूरी तरह से काल्पनिक पात्र भी गढ़े ही जाते हैं। ये लेखक की क्षमता पर निर्भर करता है। लेकिन मेरा मानना है कि कई बार यह ब्लेंडिंग कथा तत्व के लिए बहुत जरूरी होती है। एक रोचक बात मेरे लेखन में यह रही है कि मेरे काल्पनिक पात्र ज्यादा विश्वसनीय बन पड़े हैं। ऐसी पात्र भी आए हैं जो हूबहू अपनी जिंदगी से चल कर मेरी कहानियों में आ गए हैं।

मेनका त्रिपाठी- निजी अनुभवों का लेखन पर कितना प्रभाव पड़ता है ?

सूरज प्रकाश- यह सही है कि हम निजी अनुभवों से लेखन को समृद्ध करते हैं और पात्र विश्वसनीय तरीके से पाठकों तक पहुंचाते हैं लेकिन यह भी सच है कि लेखक हर समय आत्मकथा नहीं लिख रहा होता है।  उसे दूसरों के अनुभव भी अपने अनुभवों की तरह पेश करने होते हैं और इस तरह से  पात्र इतने विश्वसनीय बनते हैं कि पाठक यही समझता है कि या लेखक का निजी अनुभव है लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि वह हर बार आत्मकथा नहीं लिख रहा होता है। वह दूसरों के अनुभवों को भी अपना बना कर अपनी क्षमता से उतना ही प्रिय बना सकता है।तभी तो पाठक कहते हैं कि अरे ये तो हू ब हू मेरी कहानी है। आप तक कैसे पहुंची।

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4 Comments
  1. काफी अच्छी बातचीत है। रोचक प्रश्नों के ईमानदार जवाब है।

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  2. एक संवेदनशील लेखक का शानदार इंटरव्यू,🙏
    पीड़ा सृजन को जन्म देती है, एकदम से सही कहा सर आपने, आभार

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    • सूरज प्रकाश से मेनका की बातचीत एक लेखक के बहाने कलात्मक अनुशासन की बहुत सारी परतें खुलती है। सूरज आज के महत्तवपूर्ण रचनाकार हैं ,उन्होंने जो कहा नई पीढ़ी के लिए पाठ जैसा होगा। मेरे लिए भी ऐसा ही है। बहुत बहुत बधाई शुभकामनायें

      Reply
  3. एक संवेदनशील लेखक का शानदार इंटरव्यू,

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