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दिसंबर पर शायरी

दिसंबर पर शायरी
दिसंबर पर शायरी

दिसंबर की सर्दी है उसके ही जैसी
ज़रा सा जो छू ले बदन काँपता है
उम्मत शर्मा मय्यत

ये साल भी उदासीयां देकर चला गया
तुमसे मिले बग़ैर दिसंबर चला गया
नामालूम

दिसंबर की शब आख़िर ना पूछो किस तरह गुज़री
यही लगता था हर-दम वो हमें कुछ फूल भेजेगा
नामालूम

इक शहर फरंगां है और माह-ए-दिसंबर है
मुश्किल सभी रस्ते हैं मौसम भी सितम-गर है
अनीस फ़ारूक़ी

दिसंबर में कहा था नाँ ,कि वापिस लौट आओगे​
अभी तक तुम नहीं लौटे दिसंबर लौट आया है
नामालूम

अल्वी ये मोजिज़ा है दिसंबर की धूप का
सारे मकान शहर के धोए हुए से हैं
मुहम्मद अलवी

सैफ़ी मेरे उजले उजले कोट पर
मल गया कालक दिसंबर देख ले
मुनीर सैफी

हर दिसंबर इसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं
फिर से आँखों में तिरे ख़ाब ना आने लग जाएं
रिहाना रूही

यक्म जनवरी है नया साल है
दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है
अमीर क़ज़लबाश

दिसंबर पर शायरी

फिर आ गया है एक नया साल दोस्तो
इस बार भी किसी से दिसंबर नहीं रुका
नामालूम

इक पल का क़ुरब एक बरस का फिर इंतिज़ार
आई है जनवरी तो दिसंबर चला गया
रुख़्सार आबाद य

इरादा था जी लूँगा तुझसे बिछड़ कर
गुज़रता नहीं इक दिसंबर अकेले
ग़ुलाम मुहम्मद क़ासिर

सर्द ठिठुरी हुई लिपटी हुई सरसर की तरह
ज़िंदगी मुझसे मिली पिछले दिसंबर की तरह
मंसूर

मुझसे पूछो कभी तकमील ना होने की चुभन
मुझपे बीते हैं कई साल दिसंबर के बग़ैर
मुहम्मद अली ज़ाहिर

सामने आँखों के फिर यख़-बस्ता मंज़र आएगा
धूप जम जाएगी आँगन में दिसंबर आएगा
सुलतान अख़तर

में एक बोरी में लाया हूँ भर के मूंगफली
किसी के साथ दिसंबर की रात काटनी है
अज़ीज़ फ़ैसल

यादों की शाल ओढ़ के आवारा गर्दीयाँ
काटी हैं हमने यूं भी दिसंबर की सर्दियां
नामालूम

महीनों के माहिर की ऐसी की तैसी
दिसंबर के शायर की ऐसी की तैसी
नामालूम

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