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दरबार पर शायरी

दरबार पर शायरी
दरबार पर शायरी

सर झुका कर शाह के दरबार में
छेद हमने सौ किए दस्तार में
नबील अहमद नबील

पिंदार शब-ए-ग़म का दरबार सलामत है
पर शमा-ए-फ़रोज़ाँ का इनकार सलामत है
आतिफ़ तौक़ीर

क़सीदे ले के सारे शौकत दरबार तक आए
हमीं दो-चार थे जो हल्क़ा-ए-इनकार तक आए
ज़ुबैर रिज़वी

कहीं जंगल कहीं दरबार से जा मिलता है
सिलसिला वक़्त का तलवार से जा मिलता है
राम रियाज़

शौक़ दरबार में मिलते रहे दरबानों से
हमने आँखों से ना देखा, जो सुना कानों से
सफ़ी औरंगाबादी

दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत
दरबाँ का असा है, कि मुसन्निफ़ का क़लम है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सर-ए-दरबार ख़ामोशी तह दरबार ख़ुशीयां हैं
दर-ओ-दीवार की बातें दर-ओ-दीवार ख़ुशीयां हैं
हस्सान अहमद ऐवान

हर एक पे खुल जाये बिला फ़र्क़ मुरातिब
ऐसा हो तो दहलीज़ पे दरबार नहीं है
अंजुम ख़लीक़

एक थी जुरअत-ए-इंकार के ऐसी वैसी
एक दरबार था, दरबार भी ऐसा वैसा
जावेद सबा

दरबार पर शायरी


ज़माने के दरबार में दस्त-बस्ता हुआ है
ये दिल उसपे माइल मगर रफ़्ता-रफ़्ता हुआ है
ख़ालिद इक़बाल यासर

मेरा सर कब किसी दरबार में ख़म होता है
कूचा-ए-यार में लेकिन ये क़दम होता है
कमाल अहमद सिद्दीक़ी


दे आया अपनी जान भी दरबार इशक़ में
फिर भी ना बन सका ख़बर अख़बार‌ इशक़ में
अशर्फ़ शाद

दरबार में जब अर्ज़-ए-हुनर और तरह की
सुल्ताँ ने मेरे फ़न की क़दर और तरह की
ख़ालिद इक़बाल यासर

इस तरह कभी रानद-ए-‌ दरबार नहीं थे
रुस्वा थे मगर यूं सर-ए-बाज़ार नहीं थे
मंज़र अय्यूबी

इस दरबार में लाज़िम था अपने सर को ख़म करते
वर्ना कम अज़ कम अपनी आवाज़ ही मद्धम करते
हैदर क़ुरैशी

हर्फ़-ए-हक़ कौन कहे अब सर-ए-दरबार मियां
सर झुकाए हैं खड़े सब तिरे सरदार मियां
नामालूम

जिनकी सारी ज़िंदगी दरबार-दारी में कटी
उनको रुस्वा बरसरे दरबार होना था, हुए
मुहसिन एहसान

दामन-ए-दिल भर के ले जाते हैं अरबाब-ए-नज़र
बे नवा दरवेश का दरबार है दरबार देख
माहिर अबदालही

तक़दीर के दरबार में अलक़ाब पड़े थे
हम लोग मगर ख़ाब में बे-ख़्वाब पड़े थे
ख़ालिद मुल्क साहिल

बला से मर्तबे ऊंचे ना रखना
किसी दरबार से रिश्ते ना रखना
ताबिश मेहँदी

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