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दहेज़ पर शायरी

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दहेज़ पर शायरी
दहेज़ पर शायरी

देखी जो घर की ग़ुर्बत तो चुपके से मर गई
इक बेटी अपने बाप पे एहसान कर गई
नदीम भाभा
۔
जहेज़ मांग रहे हो ग़रूर-ओ-क़हर के साथ
मुझे कफ़न भी दिला दो , क़लील ज़हर के साथ
नामालूम
۔
कहाँ से आई है लोगो, बताओ रस्म-ए-जहेज़
ख़ुदा के दीन में इस का कोई सुराग़ नहीं
नामालूम
۔
जहेज़ मांग रहे हो, हया नहीं आती
अगर तुम्हें है गवारा तो भीक भी माँगो
नामालूम

घर ,बाप बिका , तोव बेटी का घर बसा
कितनी है नामुरदार ये रस्म-ए-जहेज़ भी
नामालूम
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करती थी बे दरेग़ इन्हें ख़र्च इसलिए
लाई थी अपने साथ वो आँसू जहेज़ में
नामालूम
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जहेज़ मांगने वालों से जा के कह देना
कि हुस्न-ए-ख़लक़ से बेहतर जहेज़ क्या होगा
अली ज़रयूंन
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तलब-ए-जहेज़ ने छीन लीं उनकी तमाम शोख़ियाँ
देखो उदास बैठी हैं हव्वा की सारी बेटियां
नामालूम

दहेज़ पर शायरी

अजीब रिवाज है दुनिया वालों का
अपनी रौनक भी दो और जहेज़ भी
नदीम भाभा
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बाप बोझ ढोता था क्या जहेज़ दे पाता
इसलिए वो शहज़ादी आज तक कुँवारी है
मंज़र भोपाली
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रस्म-ए-जहेज़ ने मार दीं बेशुमार बेटियां
अब तो इस रिवाज से हैं बेज़ार बेटियां
कैसे उन्हें जहेज़ दे, कैसे शादियां करे
जिस ग़रीब बाप की हों दो-चार बेटियां

जहेज़ कम था बहू आग में उतारी है
हमारे गांव में अब तक ये रस्म जारी है
सादिया सफ़दर सादी
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भेज कर हम जहेज़ पर लानत
अहले ग़ुर्बत की लाज रखते हैं
अबदुलहफ़ीज़ साहिल कादरी
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माँ बाप की दुआओं से बढ़कर जहेज़ में
दुल्हन को और कोई भी ज़ेवर नहीं मिला
अब्बास दाना
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शादियां दुशवार-तर करने लगी रस्मे जहेज़
लब पे आसानी से आता ही नहीं बेटी का नाम
बुलबुल काश्मीरी
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बढ़ती हुई तकरार जहेज़ की और ग़ुर्बत का बोझ
अपने आपको आग लगा के फिर एक मर गई बेटी
समीना असलम समीना

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