चिराग़ पर शायरी

चिराग़ पर शायरी

जहां रहेगा वहीं रोशनी लुटाएगा
किसी चिराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
वसीम बरेलवी

दया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहां तक रोशनी मालूम होती है
नुशूर वाहिदी

दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चिराग़ से
महताब राय ताबां

रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
वसीम बरेलवी

इस उम्मीद पे रोज़ चिराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों बाद भी आते हैं
ज़हरा निगाह

शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़म में क्या काम जलने वालों का
दाग़ध-ए-देहलवी

रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चिराग़
कम से कम रात का नुक़्सान बहुत करता है
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

चिराग़ पर शायरी

इन चराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
जावेद अख़तर

एक चिराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासह
इस के बाद तो जो कुछ है वो सब अफ़साना है
इफ़्तिख़ार आरिफ़

कौन ताक़ों पे रहा, कौन सर-ए-राह गुज़र
शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है
अहमद फ़राज़

अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है
मगर चिराग़ ने लौ को सँभाल रखा है
अहमद फ़राज़

अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सह्र थोड़ी दूर साथ चलो
अहमद फ़राज़

शहर के अंधेरे को इक चिराग़ काफ़ी है
सौ चिराग़ जलते हैं इक चिराग़ जलने से
एहतिशाम अख़तर

आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा
वर्ना आंधी में दिया किस ने जलाया होगा
मीना कुमारी नाज़

चिराग़ पर शायरी

चिराग़ उसने बुझा भी दिया जला भी दिया
ये मेरी क़ब्र पे मंज़र नया दिखा भी दिया
बशीर उद्दीन अहमद देहलवी

अपनी तस्वीर के इक रुख को निहां रखता है
ये चिराग़ अपना धुआँ जाने कहाँ रखता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

अब चराग़ों में ज़िंदगी कम है
दिल जलाओ कि रोशनी कम है
अबदुलमजीद ख़ां मजीद

कहीं कोई चिराग़ जलता है
कुछ ना कुछ रोशनी रहेगी अभी
इबरार अहमद

ख़ाक से सैंकड़ों उगे ख़ुरशीद
है अंधेरा मगर चिराग़ तले
एहसान दानिश

किसी ख़्याल किसी ख़ाब के लिए ख़ुर्शीद
दिया दरीचे में रखा था दिल जलाया था
ख़ुरशीद रब्बानी

ये कह के उसने गुल किया शम-ए-मज़ार को
जब सो गए तो किया है ज़रूरत चिराग़ की
अबदुलअज़ीज़ अंबर

मूजिद जो नूर का है वो मेरा चिराग़ है
परवाना हूँ मैं अंजुमन कायनात का

सितार-ए-ख़ाब से भी बढ़कर ये कौन बेमेहर है कि जिसने
चिराग़ और आइने को अपने वजूद का राज़-दाँ किया है
ग़ुलाम हुसैन साजिद

रवाँ-दवाँ है ज़िंदगी चिराग़ के बग़ैर भी
है मेरे घर में रोशनी चिराग़ के बग़ैर भी
अख़तर सईदी

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