चाँद पर शायरी

चाँद पर शायरी

तुम्हारा चेहरा है चांद, और चांद है ब्याबां
मरे बदन के तमाम-तर मालीकीयूल मिट्टी
ज़ीशान साजिद
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उसके चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
आसमां पे चांद पूरा था मगर आधा लगा
इफ़्तिख़ार नसीम
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कल चौधवीं की रात थी शब-भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
इबन इंशा
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चांद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
अक्स किस का है कि इतनी रोशनी पानी में है
फ़र्हत एहसास
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बेचैन इस क़दर था कि सोया ना रात-भर
पलकों से लिख रहा था तेरा नाम चांद पर
नामालूम

चाँद पर शायरी


ये चांद ही तेरी झोली में आ पड़े शायद
ज़मीं पे बैठ कमंद आसमां पे डाले जा
शहज़ाद अहमद
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चांदनी है हर एक आँगन में
मैं समझता था चांद मेरा है
इतबाफ़् अब्रक
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है मेरी और चांद की कहानी एक सी
वो बादलों में तन्हा मैं अपनों में तन्हा
नामालूम
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हमने क्या चांद कह दिया तुमको
आसमां पर बैठ गए तुम तो
जून एलिया
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मेरे गावं का हुस्न मत पूछो
चांद कच्चे मकाँ में रहता है
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हाय वो लोग गए चांद से मिलने और फिर
अपने ही टूटे हुए ख़्वाब उठा कर लाए
अबैदुल्लाह अलीम
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तुम आगए हो तो कुछ चांदनी सी बातें हों
ज़मीं पे चांद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है
वसीम बरेलवी

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