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चाँद डिनर पर बैठा है: एक संक्षिप्त विश्लेषण

स्वप्निल तिवारी
स्वप्निल तिवारी

स्वप्निल तिवारी की कविताओं का यह संग्रह “चाँद डिनर पर बैठा है” पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। इनकी ग़ज़लों में शायरी का सौन्दर्य इतने ऊँचे स्तर पर है कि पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह चाँद के साथ रात का खाना खा रहा है। चंद्रमा एक प्राकृतिक घटना है, और सोपानल तिवारी की कविता में प्राकृतिक घटनाओं का अक्सर उल्लेख किया गया है। कवि विभिन्न विषयों के वर्णन में उपमाओं और रूपकों में अनेक स्थानों पर प्रकृति के दृश्यों का प्रयोग करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कवि अपने पाठकों को सुबह से दोपहर तक और शाम से आधी रात तक (जिसके बाद यह संग्रह लिखा गया था) अपनी कविताओं के जादुई वैभव से प्रबुद्ध करेगा और इस पुस्तक के माध्यम से वह उत्कृष्ट गीत कविताओं को प्रस्तुत करेगा और इस पुस्तक के माध्यम से वह अपने पाठकों को बेहतरीन रचना देने में सफल रहे हैं।

काव्य कला ऐसी कला नहीं है के शब्दावली में महारत हासिल कर के या कठिन शब्दों को काव्य मार्ग में बांधने का कौशल रखने से कोई व्यक्ति महान कवि बन जाए। बल्कि सच्ची कला एक कठिन बात को सरलता और सहजता से व्यक्त करना है।और इस तरह बात कही जाए की पाठक के दिल में बात उतर जाए । काव्य शैली की यह विशेषता स्वप्निल तिवारी की कविता में जगह जगह मौजूद है। उन्होंने सामान्य हिंदी शब्दों को बड़ी खूबसूरती के साथ कविताओं में समाहित किया है। शब्दों के चयन, तरतीब और काव्य प्रवाह और निरंतरता को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे ये छंद नहीं हैं बल्कि कवि ने सोने के धागों में अनमोल मोती पिरो दिए हैं।

एक खुला आकाश तुझे मिल जाएगा
प्यास तू अपने पर फैलाना सहरा में

पर्बतों पर सुबह की सी धुप हूँ मैं इन दिनों
जानता हूँ अब ढ़लानों पर फिसलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी की इमेजरी बहुत दमदार है। वे अपनी कविताओं में नए और अनोखे चित्र बनाते हैं। ये चित्र अक्सर प्रतीकात्मक होते हैं, लेकिन काव्य शिल्प इतना स्पष्ट है कि पाठक इन प्रतीकों से आसानी से अर्थ निकाल सकता है। इसीलिए कई जगहों पर पुराने विषयों को नए कोणों से फिर से लिखा गया है, जिससे पता चलता है कि स्वप्निल तिवारी की कविता नवीनता से भरी है।

अभी पलक पर पलक न बैठी
ये ख़्वाब आने लगे किधर से ?

लहर बन कर उसने थोड़ी दूर तक पीछा किया
जा रहा था अपना दरिया इक शनावर छोड़ कर

किसी दिन ढ़लते सूरज के तआक़ुब में निकलना है
समन्दर में कहीं है रौशनी का एक तहखाना

जहाँ तक कवाफ़ी और रदीफ़ का सवाल है, स्वप्निल तिवारी की शाइरी में नए तजर्बे मिलते हैं। कई ग़ज़लों में उन्होंने बहुत ही अनोखी ज़मीनों का इस्तेमाल किया है। समग्र रूप से इन ग़ज़लों के अध्ययन से यह भी पता चलता है कि कवि छोटी बह्र और बड़ी बह्र दोनों में शाइरी करने की शैली जानता है। इन बह्रों में, चाहे हिंदी हो या गैर-हिंदी, उनमें मौसीक़ी और तरन्नुम अवश्य मौजूद है । काव्य लिखते समय उसकी विशेषताओं का अच्छी तरह से ध्यान रखा गया है जो इस बात का प्रतीक है कि कवि ने इस प्रकाशन के लिए रचना में कड़ी मेहनत, लगन और बहुत ध्यान से काम किया है। यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि हमारे आस-पास के कई कवि जल्दबाजी में निम्न गुणवत्ता वाली गीत-कविताओं की रचना पुस्तकों लाने की होड़ में कर रहे हैं जो उनकी कविता के लिए हानिकारक हैं। स्वप्निल तिवारी की रचनाओं को पढ़ने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि कवि ने उन पर कई बार ध्यान दिया। ताकि एक अच्छी किताब पाठक के हाथ में आ सके।

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