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चाय पर शायरी

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चाय पर शायरी
चाय पर शायरी


हमसे नफ़रत कुछ यूं भी निभाई गई
हमारे सामने चाय बना के औरों को पिलाई गई
नामालूम
۔
चाय मेरी ज़िंदगी में लाज़िम है ऐसे
आशिक़ को महबूब का दीदार हो जैसे
नामालूम

۔
पुरतकल्लुफ़ सी महकती वो सुहानी चाय
अब कहाँ हमको मयस्सर है तुम्हारी चाय
नामालूम
۔
फूल, एलबम, शायरी, चाय
ज़ात बिखरी पड़ी है कमरे में
नामालूम
۔
ढलती शाम, गहरे साय
भीगी आँखें, मैं और चाय
ज़ीशान साजिद

चाय पर शायरी

लम्स की आँच पे जज़्बों ने उबाली चाय
इशक़ पीता है कड़क चाहतों वाली चाय
۔
केतली हिजर की थी ग़म की बिना ली चाय
वस्ल की पी ना सके ,एक प्याली चाय
۔
मेरे दालान का मंज़र कभी देखो आकर
दर्द में डूबी हुई शाम ,सवाली चाय
۔
हमने मशरूब सभी मुज़िर-ए-सेहत तर्क किए
एक छोड़ी ना गई हमसे ये साली चाय
۔
ये पहेली कोई बूझोगे तो कि इस ने क्योंकर
अपने कप से मेरे कप में भला डाली चाय
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मैं यही सोच रहा था कि इजाज़त चाहूँ
इस ने फिर अपने मुलाज़िम से मंगाली चाय
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इस से मिलता है मुहब्बत के मलंगों को सिक्कों
दिल के दरबार पे चलती है धमाली चाय
۔
रंजिशें भूल के बैठीं कहीं मिलकर दोनों
अपने हाथों से पल्ला ख़ैर सगाली ,चाय
۔
इशक़ भी रंग बदल लेता है जान-ए-हया
ठंडी हो जाये तो पड़ जाती है काली चाय

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