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एक कहानी मुंबई की माया मिश्रा की

कोरोना में अपनों को खोने का गम
कोरोना में अपनों को खोने का गम

कोरोना ने न जाने कितने लोगों के जीवन को सूखे पत्तों की तरह तोड़-मरोड़ कर रख दिया है, जीवन का रस ही निचोड़ लिया है। न जाने कितनों ने अपनों को खोया है। कोरोना के बाद उन लोगों के जीवन में अनगिनत चुनौतियां पैदा हो गई है जिनके सर से अपनो का साया उठ चुका है। ऐसे में अपने लिए जीवन की राह बनाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।

कोरोना में अपनों को खोने का गम

ऐसे ही एक कहानी मुंबई की माया मिश्रा की है। कोरोना के दूसरे लहर के दौरान इनके पिता की तबियत खराब हो गई। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इन्हें कोरोना था या नहीं। लेकिन डॉक्टरों ने कोरोना के नाम पर इनसे पैसे वसूलना शुरू किया। और फिर एक दिन इन्हें हॉस्पिटल से कॉल कर बताया गया कि इनके पिता नहीं रहे। 

हालांकि हॉस्पिटल की ओर से इनके पिता का कोरोना संक्रमण टेस्ट रिपोर्ट नहीं दिया गया। डॉक्टरों की लापरवाही को कोरोना संक्रमण का नाम दे दिया गया। देखते ही देखते माया मिश्रा की दुनिया उजड़ गयी, इनके सर से पिता का साया हट गया। माया मिश्रा के परिवार में अब इनकी मां और दो भाई हैं।

इनके लिए पिता के वियोग को सहना आसान नहीं है। इनका दर्द बरबस शब्दों के रूप में उमड़ पड़ता है। 

माया मिश्रा

कविता

आज भी याद है माँ वो दिन जब ,
आप सोलह श्रृंगार करती थी ,
पापा के होने की गवाही देती थी


बिंदिया आपकी माथे की ,
चाँद को भी शर्मिंदा कर देती थी ,
माँग मे सिंदूर की लकीर ,
पापा के होने की गवाही देती थी !

माँग टीका ललाट पे झूमता ,
काजल आपकी आँखो मे ,
खूबसूरती मे चार चाँद लगता था !
गले मे सुंदर हार ,
दूर से ही चमकता था ,
कानो पे कर्ण–फूल ,
बालो के बीच झलकता था !
मेहन्दी आपके हाथो की ,
पापा के प्यार में रंग रंगी थी ,

चूड़ियाँ  आपकी कलाई मे ,
कई रंगो की सजी थी !
नाक पे छोटी सी नथनी माँ,
आपकी सुंदरता को और बड़ा देती।
उंगलियों की अंगूठियाँ ,
आपकी कमर पे कमर– बंद ,
बाजू पे बाजू– बंद और

 आप जब चलती थी ,
आपके पायल बोल उठते थे,
बिछुए आपके पैर मे ,
सुहाग की निशानी सारे पहन कर
एक दम परी जैसी दिखती थी ,आप
वह आपका सोलह  श्रृंगार  
पापा के होने की गवाही देती थी माँ

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