ऊँचाई(बुलंदी)शायरी

ऊँचाई (बुलंदी) शायरी

आसमां इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है
वसीम बरेलवी
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा किया है
अल्लामा इक़बाल
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ज़रा ये भी तो देखो हँसने वालो
कि मैं कितनी बुलंदी से गिरा हूँ
नूर क़ुरैशी
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ग़ौर से देखो हमें देख के इबरत होगी
ऐसे होते हैँ बुलंदी से उतरते हुए लोग
नामालूम
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शोहरत की फ़िज़ाओं में इतना ना उड़ो साग़र
परवाज़ ना खो जाये इन ऊंची उड़ानों में
साग़र अज़मी

यारो में इस नज़र की बुलंदी को क्या करूँ
साया भी अपना देखता हूँ आसमान पर
शकेब जलाली
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तमन्ना सर-बुलंदी की हमें भी तंग करती है
मगर हम दूसरों को रौंद कर ऊंचा नहीं होते
नामालूम
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ऊँचाई(बुलंदी)शायरी


तुम आसमां की बुलंदी से जल्द लौट आना
मुझे ज़मीं के मसाइल की बात करनी है
ज़ीशान साजिद
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देखते क्यों हो शकेब इतनी बुलंदी की तरफ़
ना उठाया करो सर को कि ये दस्तार गिरे
शकेब जलाली

आप अगर तख़तनशीं हैं तो बड़ी बात नहीं
धूल भी उड़ के बुलंदी पे पहुंच जाती है
नामालूम
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शौहरत की बुलंदी भी पल-भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
बशीर बदर
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हमें फंसा के यहां फ़ासलों के चक्कर में
ज़मीं ज़रूर कहीं आसमां से मिलती है
नामालूम
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मुझसे ऊंचा तेरा क़द है, हद है
फिर भी सीने में हसद है, हद है
अशक आँखों से ये कह कर निकला
ये तेरे ज़बत की हद है , हद है
नामालूम

हौसले थे कभी बुलंदी पर
अब फ़क़त बेबसी बुलंदी पर
सिराज फ़ैसल ख़ान
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ऊँचाई(बुलंदी)शायरी


इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले
अब जो बादल हैं धुआँ थे पहले
अज़हर अनाएती
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अगर बुलंदी का मेरी वो एतराफ़ करे
तो फिर ज़रूरी है आकर यहां तवाफ़ करे
अख़तर शाहजहांपूरी

बुलंदी से उतारे जा चुके हैं
ज़मीं पर ला के मारे जा चुके हैं
ज़फ़र गोरखपुरी
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सदाक़त सादगी ओढ़े बुलंदी थाम लेती है
शहंशाह की रसाई को फ़क़ीरी थाम लेती है
तौफ़ीक़ सागर
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क़सम ख़ुदा की बुलंदी से गुफ़्तगु करते
उड़ान भरने से पहले अगर वुज़ू करते
नवाज़ असीमि
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बुलंदी से कभी वो आशनाई कर नहीं सकता
जो तेरे आस्ताने की गदाई कर नहीं सकता
अफ़ज़ल इलाहाबादी

ख़यालों की बुलंदी ज़ात की खाई से बेहतर है
समुंद्र तेरा साहिल तेरी गहराई से बेहतर है
नसीम निकहत
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ऊँचाई(बुलंदी)शायरी


पस्ती से बुलंदी पर खींचा है सितारों ने
सदीयों के तजस्सुस ने क़रनों के इशारों ने
महर ज़रीं
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आसमानों की बुलंदी से उतर आया हूँ
ए ज़मीं मुझको सहारा दे में घर आया हूँ
सय्यद शेबान कादरी
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इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने ना दिया
हमको परवाज़ का मौक़ा ही हवा ने ना दिया
मंज़र भोपाली
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मुहब्बत की बुलंदी से कभी उतरा नहीं जाता
तिरा दर छोड़ के मुझसे कहीं जाया नहीं जाता
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

बुलंदी भी नशेबों की तरह लगने लगी है
बुलंदी से उतरना अब ज़रूरी हो गया है
खुशबीर सिंह शाद
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जिस घर की बुलंदी पे मुझे नाज़ था काज़िम
मैं आज उसी घर की बुलंदी से गिरा हूँ
काज़िम जरोली
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निगाहें नीची रखते हैं बुलंदी के निशाँ वाले
उठा कर सर नहीं चलते ज़मीं पर आसमां वाले
तरफ़ा क़ुरैशी
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ऊँचाई(बुलंदी)शायरी


जिस बुलंदी पे रज़ा मैंने सजाये तमगे
इस बुलंदी पे ही टूटा हुआ कासा रखा
हाशिम रज़ा जलालपूरी
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पहाड़ों की बुलंदी पर खड़ा हूँ
ज़मीं वालों को छोटा लग रहा हूँ
सुलेमान ख़ुमार

यहां वहां की बुलंदी में शान थोड़ी है
पहाड़ कुछ भी सही आसमान थोड़ी है
शुजाअ ख़ावर
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सर-बुलंदी है ख़ाकसारी में
इन्किसार इख़तियार कर पहले
अशोक साहनी

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