Home » Blog » बहार पर शायरी

बहार पर शायरी

बहार पर शायरी
बहार पर शायरी

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़ाब की ताबीर बताने वाला
अहमद फ़राज़

मेरी ज़िंदगी पे ना मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं
जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ां बहार से कम नहीं
शकील बद एवनी

बहारआए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने
कैफ़ी आज़मी

बहारों की नज़र में फूल और कांटे बराबर हैं
मुहब्बत क्या करेंगे दोस्त दुश्मन देखने वाले
कलीम आजिज़

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार
गुल बना सकता है तो शबनम बना सकता हूँ मैं
नुशूर वाहिदी

ए दिल बेक़रार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा
साग़र सिद्दीक़ी

इस को ख़िज़ां के आने का, क्या रंज क्या क़लक़
रोते कटा हो जिसको ज़माना बहार का
जगत मोहन लाल रवां

अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न
हमको ख़िज़ां ने, तुमको सँवारा बहार ने
इजतिबा रिज़वी

बहार पर शायरी

टुक देख लें चमन को, चलो लाला-ज़ार तक
क्या जाने फिर जिएँ ना जिएँ हम बहार तक
मीर हुस्न

लुतफ़ बहार कुछ नहीं गो है वही बहार
दिल ही उजड़ गया कि ज़माना उजड़ गया
अज़ीज़ लखनवी

ये सोचते ही रहे और बहार ख़त्म हुई
कहाँ चमन में नशेमन बने कहाँ ना बने
असर लखनवी

तिनकों से खेलते ही रहे आशयां में हम
आया भी और गया भी ज़माना बहार का
फ़ानी बद एवनी

जब से छूटा है गुलसिताँ हमसे
रोज़ सुनते हैं बहार आई है
जलील मानक पूरी

मुझको एहसासे रंग-ओ-बू ना हुआ
यूं भी अक्सर बहार आई है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी

तेरे क़ुर्बान क़मर, मुँह सर-ए-गुलज़ार ना खोल
सदक़े उस चांद सी सूरत पे ना हो जाये बहार
क़मर जलालवी

ए ख़िज़ां भाग जा चमन से शिताब
वर्ना फ़ौज बहार आवे है
शेख़ ज़हूर उद्दीन हातिम

बहार पर शायरी

ख़िज़ां का भेस बना कर बहार ने मारा
मुझे दूरं गई लैल-ओ-निहार ने मारा
आरज़ू लखनवी

ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी
फिर उस के बाद ना आया बहार का मौसम
सलाम संदेलवी

कहियो सबा सलाम हमारा बहार से
हम तो चमन को छोड़ के सूए क़फ़स चले
मुहम्मद रफ़ी सौदा

मेरी बहार में आलम ख़िज़ां का रहता है
हुआ जो वस्ल तो खटका रहा जुदाई का
जलील मानक पूरी

शाख़ों से बरग-ए-गुल नहीं झड़ते हैं बाग़ में
ज़ेवर उतर रहा है अरूस बहार का
अमीर मीनाई

बहार आई कि दिन होली के आए
गलों में रंग खेला जा रहा है
जलील मानक पूरी

शगफ़तगई दिल कारवां को क्या समझे
वो इक निगाह जो उलझी हुई बहार में है
शकील बद एवनी

अजब बहार दिखाई लहू के छींटों ने
ख़िज़ां का रंग भी रंग-ए-बहार जैसा था
जुनैद हज़ीं लारी

गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट
ख़िज़ां मचाएगी आते ही इस दयार में लूट
हबीब मूसवी

बहार पर शायरी

आज है वो बहार का मौसम
फूल तोड़ूँ तो हाथ जाम आए
जलील मानक पूरी

जो थी बहार तो गाते रहे बहार का राग
ख़िज़ां जो आई तो हम हो गए ख़िज़ां की तरफ़
जलील मानक पूरी

गई बहार मगर अपनी बे-ख़ुदी है वही
समझ रहा हूँ कि अब तक बहार बाक़ी है
मुबारक अज़ीमाबादी

मैं उस गुलशन का बुलबुल हूँ, बहार आने नहीं पाती
के सय्याद आन कर मेरा गुलसिताँ मोल लेते हैं
हैदर अली आतिश

आमद आमद है ख़िज़ां की, जाने वाली है बहार
रोते हैं गुल-ए-ज़ार के दर बाग़बाँ खोले हुए
ताश्शुक़ लखनवी

ना सैर-ए-बाग़, ना मिलना, ना मीठी बातें हैं
ये दिन बहार के ऐ जान मुफ़्त जाते हैं
नाजी शाकिर

इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
आज तक सुलगते हैं ज़ख़म रहगुज़ारों के
साहिर लुधियानवी

ग़रूर से जो ज़मीं पर क़दम नहीं रखती
ये किस गली से नसीम-ए-बहार आती है
जलील मानक पूरी

बहार पर शायरी

तड़प के रह गई बुलबुल क़फ़स में ऐ सय्याद
ये क्या कहा कि अभी तक बहार र बाक़ी है
बेताब अज़ीमाबादी

बहार आते ही टकराने लगे क्यों साग़र-ओ-मीना
बता ऐ पीर मय-ख़ाना ,ये मय-ख़ानों पे क्या गुज़री
जगन नाथ आज़ाद

बहार आई गुलों को हंसी नहीं आई
कहीं से बू तेरी गुफ़तार की नहीं आई
काली दास गुप्ता रज़ा

मेरे ख़्याल की वुसअत में हैं हज़ार चमन
कहाँ कहाँ से निकालेगी ये बहार मुझे
शौक़ असर रामपूरी

क्या ख़बर मुझको ख़िज़ां क्या चीज़ है कैसी बहार
आँखें खोलीं, आ के मैंने, ख़ाना-ए-सय्याद में
मुंशी अमीर अल्लाह तस्लीम

उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी
जहां-जहां से बहारों के कारवां निकले
साहिर लुधियानवी

चार दिन की बहार है सारी
ये तकब्बुर है यार-ए-जानी, हीच
हक़ीर

अपने दामन में एक तार नहीं
और सारी बहार बाक़ी है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी

नई बहार का मुज़्दा बजा सही लेकिन
अभी तो अगली बहारों का ज़ख़्म ताज़ा है
शफ़क़त काज़मी

बहार पर शायरी

क्या उसी को बहार कहते हैं
लाला-ओ-गुल से ख़ूँ टपकता है
सलाम संदेलवी

आएँगे वक़्त ख़िज़ां ,छोड़ दे, आई है बहार
ले-ले सय्याद कसम, रख दे गुलसिताँ सर पर
ख़्वाजा मुहम्मद वज़ीर

ख़िज़ां रुख़स्त हुई, फिर आमद फ़स्ल-ए- बहारी है
गरीबां ख़ुद बख़ुद होने लगा है, धज्जियाँ मेरा
मिर्ज़ा जाह अनजमु

शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ साबिर
जहां में मिस्ले नसीम-ए-बहार हम भी हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर

फूल पर गुलशन के गोया दाना-ए-शबनम नहीं
आशिक़ों के हाल पर आँखें फिराती है ,बहार
राम मुख़लिस

क्या हंगाम-ए-गुल ने मेरा जोश-ए-जुनूँ ताज़ा
उधर आई बहार ईधर गरेबां का रफ़ू टूटा
मीर मुहम्मदी बेदार

बहार चाक-ए- गरेबां में ठहर जाती है
जुनूँ की मौज कोई आस्तीं में होती है
अज़ीज़ हामिद मदनी

Share This Post
Have your say!
00

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>