बहन पर शायरी

बहन पर शायरी

ज़िंदगी-भर की हिफ़ाज़त की क़सम खाते हुए
भाई के हाथ पे इक बहन ने राखी बाँधी
नामालूम

किसी के ज़ख़म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा
मुनव्वर राना

बहनों की मुहब्बत की है अज़मत की अलामत
राखी का है तहवार मुहब्बत की अलामत
मुस्तफ़ा अकबर

बहन का प्यार जुदाई से कम नहीं होता
अगर वो दूर भी जाये तो ग़म नहीं होता
नामालूम
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बहन की इल्तिजा माँ की मुहब्बत साथ चलती है
वफ़ा-ए-दोस्ताँ बहर मशक़्क़त साथ चलती है
सय्यद ज़मीर जाफ़री


अज़ल से बरसे है पाकीज़गी फ़लक से यहां
नुमायां होवे है फिर शक्ल बहन में वो यहां
दीपक पुरोहित
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साबित तो रह जफ़ा पे में क़ायम वफ़ा पे हूँ
मैं अपनी बाण छोड़ूँ ना तो अपनी आन छोड़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

बहन पर शायरी

माएं सहती हैं किस क़दर दुखड़े
बहनें होती हैं कितनी दुखियारी
फ़र्ख़ ज़हरा गिलानी
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शाम पर शाम-ए-अबद थी भाई
कितनी बहनों की रिदाएँ हुईं रद्द
बिलाल अस्वद

मैं शाकिर बे रिदा बहनों के सर पे
रिदाएँ ओढ़ देना चाहता हूँ
मुहम्मद उसमान शाकिर
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तुझे घर से भगा सकता हूँ तेरे
मगर बहनों का चेहरा मारता है
अली रज़ा रज़ी
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हमदर्द हूँ गय्यूर हूँ और पर-ख़ुलूस हूँ
ऐ कारसाज़ बहनों को अब ऐसे भाई दे
जे़ब उन्निसा ज़ेबे

भाई बहनों की मुहब्बत का नशा मत पूछिए
बे-तकल्लुफ़ हो गए तो गुदगुदी आ गई
इफ़्तिख़ार फ़लक काज़मी
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लोग अब उसको भी अवतार समझ लेते हैं
छीन लेता है जो बहनों की रिदाएँ बाबा
गुलशन ब्याबानी

बहन पर शायरी


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अम्बर से कह दो बादलों को अब रिहा करे
झूलों की रुत है बहनों का आँगन उदास है
सरदार पंछी
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मौत से रिश्ता मिरा माँ की तरह है सादी
ज़िंदगी लगती है मुझको सगी बहनों की तरह


भाई सभी पसंद की शादी के हक़ में थे
बहनों ने ख़ाब देखे तो ग़ैरत में आ गए
अहमद सज्जाद बाबर

उन गली कूचों में बहनों का मुहाफ़िज़ कौन है
कस्ब-ए-ज़र की दौड़ में बस्ती से माँ जाये गए
तालिब जौहरी
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ये बेटों के सर भाई का ख़ूँ , बहनों की चीख़ें
इबरत हो अगर हमको ये सौग़ात बहुत है
क़ाज़ी एहतिशाम बछरोनी
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अमन के ख़ाहां हैं जब अफ़सर जहां वाले तमाम
कश्मकश रहती है फिर इतनी जहाँ-बानों में क्यों
अफ़्सर मेरठी
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जिससे इस नन्हे बच्चे की माँ बहनों का क़तल हुआ
मौसिम-ए-गुल का हर इक मंज़र ख़ूनी मंज़र लगता है
आशा प्रभात

बहन पर शायरी


ईमान की छागल फूट गई आमाल की लाठी टूट गई
हम ऐसे गल्लाबानों के सब नाक़े ख़ौफ़-ए-क़िताल में हैं
अरशद अबद अलहमेद

अब तक थे वाबस्ता जो अलफ़ाज़ के तानों बाणों से
अपनी क़ीमत मांग रहे हैं बे क़दरे इन्सानों से
शकील हैदर

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सगी बहनों का जो रिश्ता रिश्ता है उर्दू और हिन्दी में
कहीं दुनिया की दो ज़िंदा ज़बानों में नहीं मिलता
मुनव्वर राना
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