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बदन पर शायरी

बदन पर शायरी
बदन पर शायरी

उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन
देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं
क़तील शिफ़ाई

किसी कली किसी गुल में किसी चमन में नहीं
वो रंग है ही नहीं जो तिरे बदन में नहीं
फ़र्हत एहसास

तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक बदन कहाँ
ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ
लाला माधव राम जोहर

बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ में
कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ में
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

कौन बदन से आगे देखे औरत को
सबकी आँखें गिरवी हैं इस नगरी में
हमीदा शाहीन

ख़ुदा के वास्ते गुल को ना मेरे हाथ से लो
मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी
नज़ीर अकबराबादी

गूँध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है
रंग-ए-बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में
मीर तक़ी मीर

याद आते हैं मोजज़े अपने
और उसके बदन का जादू भी
जून ईलिया

मैं उसके बदन की मुक़द्दस किताब
निहायत अक़ीदत से पढ़ता रहा
मुहम्मद अलवी

बदन पर शायरी

नूर बदन से फैली अंधेरे में चांदनी
कपड़े जो उसने शब को उतारे पलंग पर
लाला माधव राम जोहर

हाय वो उस का मौज-ख़ेज़ बदन
मैं तो प्यासा रहा लब-ए-जौ भी
जून ईलिया

क्या बदन है कि ठहरता ही नहीं आँखों में
बस यही देखता रहता हूँ कि अब क्या होगा
फ़र्हत एहसास

रास्ता दे कि मुहब्बत में बदन शामिल है
मैं फ़क़त रूह नहीं हूँ मुझे हल्का ना समझ
साक़ी फ़ारूक़ी

रूह को रूह से मिलने नहीं देता है बदन
ख़ैर ये बीच की दीवार गिरा चाहती है
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

शर्म भी इक तरह की चोरी है
वो बदन को चुराए बैठे हैं
अनवर देहलवी

इक बूँद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
शहरयार

वो अपने हुस्न की ख़ैरात देने वाले हैं
तमाम जिस्म को कासा बना के चलना है
अहमद कमाल परवाज़ी

बदन पर शायरी

रख दी है उसने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब
सादा वर्क़ पे ले कोई मंज़र उतार दे
प्रेम कुमार नज़र

ढूंढता हूँ मैं ज़मीं अच्छी सी
ये बदन जिसमें उतारा जाये
मुहम्मद अलवी

मगर गिरिफ़त में आता नहीं बदन उस का
ख़्याल ढूँढता रहता है इस्तिआरा कोई
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

अँधेरी रातों में देख लेना
दिखाई देगी बदन की ख़ुशबू
मुहम्मद अलवी

जी चाहता है हाथ लगा कर भी देख लें
उसका बदन क़बा है कि उसकी क़बा बदन
प्रेम कुमार नज़र

मैं तेरी मंज़िल-ए-जाँ तक पहुंच तो सकता हूँ
मगर ये राह बदन की तरफ़ से आती है
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

लगते ही हाथ के जो खींचे है रूह तन से
क्या जानें क्या वो शैय है उसके बदन के अंदर
जुर्रत क़लंदर बख़श

अब देखता हूँ मैं तो वो अस्बाब ही नहीं
लगता है रास्ते में कहीं खुल गया बदन
फ़र्हत एहसास

बदन पर शायरी

क्या सबब तेरे बदन के गर्म होने का सजन
आशिक़ों में कौन जलता था, गले किस के लगा
आबरू शाह मुबारक

क्या-क्या बदन साफ़ नज़र आते हैं हमको
क्या-क्या शिकम-ओ-नाफ़ नज़र आते हैं हमको
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्या बदन होगा कि जिसके खोलते जामे का बंद
बरग-ए-गुल की तरह हर नाख़ुन मुअत्तर हो गया
इनाम अल्लाह ख़ां यक़ीन

चमन वही कि जहां पर लबों के फूल खुलें
बदन वही कि जहां रात हो गवारा भी
असअद बद एवनी

ये बे-कनार बदन कौन पार कर पाया
बहे चले गए सब लोग इस रवानी में
फ़र्हत एहसास

बदन पे पैरहन-ए-ख़ाक के सिवा किया है
मेरे अलाव में अब राख के सिवा किया है
हिमायत अली शायर

बहुत लंबी मुसाफ़त है बदन की
मुसाफ़िर मुबतदी थकने लगा है
प्रेम कुमार नज़र

मुहब्बत के ठिकाने ढूँढती है
बदन की ला-मकानी मौसमों में
नसीर अहमद नासिर

यूं है डलक बदन की इस पैरहन की तह में
सुर्ख़ी बदन की जैसे छिलके बदन की तह में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर एक साज़ को साज़िंदगाँ नहीं दरकार
बदन को ज़र्बत-ए-मिज़राब से इलाक़ा नहीं
ज़िया अलमस्तफ़ा तर्क

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