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नमिता मॉडेर की कहानी

बच्चों की बीमारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जोड़ना एक घातक मानसिकता - नमिता मॉडेर
बच्चों की बीमारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जोड़ना एक घातक मानसिकता - नमिता मॉडेर

शिक्षा और आर्थिक संपन्नता जीवन स्तर को बेहतर बना सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि यह वैचारिक गुणवत्ता को बढ़ा सकें। गांव हो,शहर हो या देश-विदेश का महानगर कही का कोई भी इंसान रूढ़िवादी हो सकता है, कुण्ठाग्रस्त हो सकता है। अब बच्चों में सुनने या बोलने की समस्या को ही ले लिया जाए, बहुत सारे पढ़े-लिखे माता-पिता गांवों के अनपढ़ मां-बाप की तरह ही यह स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनके बच्चे उम्र के हिसाब से सुनने और बोलने की समस्या है। बच्चों के बोलने और सुनने की समस्या एक टैबू की तरह है, अभिभावक इस समस्या को अपनी प्रतिष्ठा के साथ जोड़ देते है। कैलिफोर्निया की जानी-मानी  स्पीच लैंग्वेज पैथोलोजिस्ट (Speech language pathologist) नमिता मॉडेर बताती है कि छोटे बच्चों में सुनने और बोलने की बीमारी बढ़ने के पीछे मां-बाप की अनदेखी एक महत्वपूर्ण कारण है।बच्चों की बीमारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जोड़ना एक घातक मानसिकता है

बच्चों का आत्मकेंद्रित सामाजिक व्यवहार

नमिता बताती है कि बच्चों का आत्मकेंद्रित सामाजिक व्यवहार का सीधा संबंध उसके सुनने और बोलने की समस्या से होता है। जो बच्चे दूसरे बच्चों के साथ खेलने के बजाए अपने ही खिलौने से खेलने की व्यस्त रहते हैं, दूसरों के साथ घुलने-मिलने के बजाए अलग रहना पसंद करते है तो हो सकता है कि उस बच्चे को सुनने औऱ बोलने की समस्या हो।

नमिता मॉडेर

सामाजिक व्यवहार में भी अपेक्षित प्रगति

जो बच्चे ठीक से सुन नहीं पाते उनके सामाजिक व्यवहार में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाता है। जब तक कोई बच्चा किसी की बात सुनेगा नहीं, समझेगा नहीं तब तक वह किसी के बातों का अनुकरण कैसे कर सकता है! अनुकरण न करने के कारण उसके व्यवहार में कोई प्रगतिजन्य बदलाव नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे प्रायः अपने आप में ही मगन रहते हैं। अन्य बच्चों के साथ वो घुलमिल कर नहीं रहते। अन्य बच्चों की मौजूदगी में ऐसे बच्चे अकेले ही खेलने में व्यस्त रहते हैं।

अपनी माटी से ममत्व तनिक भी कम नहीं हुआ

कैलिफोर्निया में रहने के बावजूद नमिता का अपने देश, अपनी माटी से ममत्व तनिक भी कम नहीं हुआ है। वो अपने व्यस्त जीवन से समय निकाल कर देश आती है और सेमिनार, वर्कशॉप आदि के जरिए इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाती रहती हैं। बिहार की इस बेटी पर आज सभी को गर्व है। वो All India Institute Of Speech and Hearing, IIT कानपुर सहित देश की कई प्रतिष्ठित एकेडमिक संस्थाओं के साथ जुड़ कर इस संदर्भ में काम कर रही हैं।

नमिता का मानना है कि बच्चों की बीमारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ना एक घातक  मानसिकता है। यह जान-बूझकर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। अजीब विडम्बना है कि आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में भी जन्मजात बीमारियों से पीड़ित बच्चों को दोयम दर्जे का समझा जाता है जबकि इनका इलाज संभव है।

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