बच्चों के आत्मकेंद्रित व्यवहार से श्रवण और बोलने की बीमारी को पहचाना जा सकता है

बच्चों के आत्मकेंद्रित व्यवहार से श्रवण और बोलने की बीमारी को पहचाना जा सकता है

BY नेहा तिवारी

अक्सर समाज में बोलने और सुनने की समस्या से पीड़ित इंसान दिखाई देते हैं। और, हम इन्हें विकलांग समझ बैठते है। हम यह सोचते ही नहीं कि अगर इनके बचपन में ही इस बीमारी की पहचान कर ली जाती, सटीक उपचार की जाती तो आज ये विकलांग नहीं होते।

About Neha Tiwari

नेहा तिवारी पेशे से ऑडियोलॉजिस्ट, स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट हैं। इनके अनुसार बच्चों के सामाजिक व्यवहार के सिलसिलेवार विश्लेषण के आधार पर उसके सुनने और बोलने की क्षमता को समाज जा सकता है। इस संदर्भ में नेहा वर्कशॉप और सेमिनार के द्वारा जागरूकता फैलाती रहती हैं। इनके पति सेना में ऑफिसर हैं जिसके कारण उनका अक्सर ट्रांसफर होते रहता है। नतीजन नेहा को देश के कई शहरों में रहने का मौका मिला। उन्होंने कई राज्यों के अलग-अलग शहरों के बच्चों के बीच काम किया है। नेहा के काम का फोकस बीमारी की रोकथाम पर केंद्रित होता है। वो शुरुआती लक्षणों के आधार पर बीमारी को चिन्हित करने और उसके रोकथाम के सिद्धांत पर काम करती हैं जो अपने आप में प्रेरणादायी बात है क्योंकि आजकल के ज्यादातर डॉ. सीधे उपचार की बात करते है। ये बीमारी के बढ़ने के बाद होता है।

सामाजिक व्यवहार से समस्या समझें

बच्चों की बोली, उसके सामाजिक व्यवहार पर अगर गौर किया जाए तो उसके श्रवण और बोलने की समस्या की चिन्हित किया जा सकता है। और फिर उसके उपचार से बीमारी को ठीक किया जा सकता है। लगभग 11 महीने के बाद बच्चे बोलने की कोशिश करते हैं। यह उनके बोलने का पहला प्रयास होता है, वो एकल शब्द का उच्चारण करते हैं। यह क्रम तेजी से बढ़ता है, 16 महीने के बच्चे को एक दिन में 40 शब्द बोलना शुरू कर देना चाहिए। 2 साल की उम्र में बच्चे दो शब्दों को एक साथ बोलने का प्रयास करने लगते है।

अगर बच्चे सही समय पर नहीं बोल रहे हैं तो यह भी हो सकता है कि वो ठीक से सुनते नहीं हो। जिन बच्चों के श्रवण शक्ति कम होती है वो ठीक से बोल भी नहीं पाते। बोलने और सुनने की क्षमता में साथ-साथ विकास होना जरूरी है।


नेहा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सचेचता के जरिए भी निरंतर जागरूकता फैला रही हैं। 

समस्या को तीन स्तरों पर देखिये

जो बच्चे ठीक से सुन नहीं पाते उनके सामाजिक व्यवहार में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाता है। जब तक कोई बच्चा किसी की बात सुनेगा नहीं, समझेगा नहीं तब तक वह किसी के बातों का अनुकरण कैसे कर सकता है! अनुकरण न करने के कारण उसके व्यवहार में कोई प्रगतिजन्य बदलाव नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे प्रायः अपने आप में ही मगन रहते हैं। अन्य बच्चों के साथ वो घुलमिल कर नहीं रहते। अन्य बच्चों की मौजूदगी में ऐसे बच्चे अकेले ही खेलने में व्यस्त रहते हैं।

इस समस्या को तीन स्तरों पर देखना चाहिए। पहला है विकार, दूसरा उपचार और तीसरा विकलांग। विकार, उपचार गौर करना चाहिए। बच्चों के व्यवहार में असमान बदलाव को नोटिस कर हम उसके विकार या बीमारी को पहचान सकते है। फिर सटीक उपचार के जरिए इसका इलाज किया जा सकता है ताकि उसे विकलांग होने से बचाया जा सकता।

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