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आंग सान सू ची को म्यांमार की सैन्य अदालत द्वारा दी गई चार साल की कैद की सजा

म्यांमार के पूर्व राष्ट्रपति आंग सान सू ची को वहां सैन्य अदालत द्वारा चार साल की कैद की सजा सुनाई गई है। वहाँ की सैन्य सरकार द्वारा आंग सान सू ची पर कई आरोप लगाई गई है। इसी के सुनवाई के बाद उन्हें चार साल की सजा सुनाई गई है। सू ची पर आरोप लगाया गया है कि वो बिना लाइसेंस लिए ही वॉकी-टॉकी का उपयोग कर रही है।

वो पहले से नज़रबंद हैं

यह कोई पहला मौका नहीं है जब सू ची को सजा सुनाई गई है। वो पहले से भी नज़रबंद ही हैं। दरअसल, म्यांमार में वहां की सेना ने सू ची की लोकतांत्रिक सरकार को जबरन पलट कर सत्ता पर अधिकार कर लिया है। और उन्हें नज़रबंद कर दिया गया है। उसके बाद उन पर रह-रह कर आरोप लगाया जाता है और उनकी नज़रबंद की अवधी बढ़ा दी जाती है। गौरतलब है कि फ़रवरी में वहां की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्तापलट करते हुए सू ची को गिरफ्तार कर लिया है।

इसके बाद इन्हें दिसंबर में कोरोना संबंधी नियमों को न मानने के आरोप में चार साल की जेल की सज़ा सुनाई गई। इनकी सजा को वहां की जनता में व्यापक जनाक्रोश उमड़ पड़ा था। इसको भांपते हुए सेना ने इनकी सज़ा की अवधी कम करते हुए चार से घटा कर ढाई साल का कर दिया तथा उन्हें जेल भेजने के बदले हाउस अरेस्ट कर लिया गया।
हालांकि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में यह खबरें प्रकाशित हुई है कि फरवरी में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लेने के बाद वहां कई हिंसक प्रदर्शन हुए जिसमें तकरीबन 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई।

लोगों ने प्रदर्शन का परम्परावादी तरीका अपनाया

उल्लेखनीय है कि जब वहां की सेना ने हथियार के बल पर बर्बरतापूर्ण तरीके से जन प्रदर्शन को कुचल दिया तब वहां के लोगों ने प्रदर्शन का परम्परावादी तरीका अपनाया। वह है थाली बजाना। वहां की जनता ने थाली बजा कर अपना विरोध प्रदर्शन व्यक्त किया। यह एक अहिंसक तरीका भी रहा। लेकिन सेना ने इसे भी दबाने का भरपूर प्रयास किया।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस सैन्य कार्यवाई की जमकर आलोचना की गई है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सू ची की गिरफ्तारी का जमकर विरोध हुआ है। ह्युमन राइट्स वॉच की शोधकर्ता मेनी मॉन्ग ने इस फैसले पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे सैन्य सत्ता द्वारा जन असंतोष को और उभारने वाला कदम बताया। मेनी मॉन्ग ने कहा है कि पिछली बार जब सू ची को सज़ा सुनाई गई थी तब म्यांमार में सोशल मीडिया पर सबसे अधिक चर्चा हुई जो जनाक्रोश का कारण बना। नतीजन व्यापक हिंसा हुई। अब इस फैसले से आक्रोश फिर भड़क सकता है। सेना को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है।

मीडिया को बहस सुनने की इजाजत नहीं दी गई

सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे सुनवाई के दौरान मीडिया को बहस सुनने की इजाजत नहीं दी गई थी। इसके साथ सू ची के वकील को भी मीडिया से मिलने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

कौन है आंग सान सू की ?

 आंग सान सू की बर्मा (म्यांमार) की लोकतांत्रिक विचारों वाली राजनयिक तथा नेशनल लीग फार डेमोक्रेसी की नेता हैं। ये वहां की प्रधानमंत्री भी बन चुकी है। इनके पिता आंग सान को बर्मा का राष्ट्रपिता कहा जाता हैं। इनके पिता की 1949 में हत्या कर दी गयी थी। इसके बाद आंग सान सू की ने बर्मा में लोकतन्त्र की स्थापना के लिए बहुत ही लम्बा और कठिन संघर्ष किया है।

  • कई अंतरराष्ट्रीय सम्मानों, पुरस्कारों से नवाजे जा चुकी हैं आंग सान सू की।
  • आंग सान सू की को वर्ष 1990 में राफ्तो पुरस्कार दिया गया।
  • इसी साल स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति के लिए सखारोव पुरस्कार दिया गया।
  • वर्ष 1992 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया
  • इसी साल यानी वर्ष 1992 में इन्हें अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य के लिए भारत सरकार द्वारा जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया

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