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अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम
अमृता प्रीतम

“हम एक ऐसे मआशरे में रहते हैं जहाँ मर्द एक ग़ुसुल करके पाक हो जाता है. जबकि औरत अपनी पाकीज़गी साबित करने के लिए पूरी ज़िंदगी लुटा देती है.”
ये कथन उस महान लेखिका का है जिनका माथा चूमते हुए वियतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिन्ह ने कहा था “हम दोनों सिपाही हैं. तुम क़लम से लड़ती हो, मैं तलवार से लड़ता हूँ.”


31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला पाकिस्तान में जन्मी अमृता प्रीतम ने उर्दू, पंजाबी और हिंदी में ढेर सारी कविताएँ, कहानियां और उपन्यास लिखे। उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 100 किताबें लिखी हैं जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी शामिल है।
अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान “पद्मविभूषण” भी प्राप्त हुआ। “साहित्य अकादमी” पुरस्कार से पहले ही नवाज़ा जा चुका था जबकि बाद में उन्हें “ज्ञानपीठ” पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

अमृता प्रीतम के किस्से


यूँ तो अकसर अमृता प्रीतम का ज़िक्र गीतकार-शायर साहिर लुधियानवी और चित्रकार इमरोज़ से जुड़े क़िस्सों के लिए होता रहता है लेकिन लोग अक्सर भूल जाते हैं कि उनकी एक मात्र शादी प्रीतम सिंह से हुई थी जिसने उन्हें अमृता कौर से अमृता प्रीतम बना दिया।
अमृता प्रीतम को 1947 में लाहौर छोड़कर भारत आना पड़ा था और बंटवारे पर लिखी उनकी कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूँ’ सरहद के दोनों ओर के उजड़े लोगों की टीस को एक सा बयां करती है कि दर्द की कोई सरहद नहीं होती।


उन्होंने कई ऐसी कहानियाँ लिखीं जो औरत और मर्द के रिश्तों को औरत के नज़रिए से टोटलती रहीं- मसलन उनका मशहूर उपन्यास पिंजर जिसपर “पिंजर” नाम की फिल्म बनी जो एक हिंदू लड़की, पूरो की कहानी है जो बंटवारे की विभीषिका को झेलती है।
उनके उपन्यास ‘धरती, सागर ते सीपियाँ’ जिस पर 70 के दशक में शबाना आज़मी के साथ “कादंबरी” फ़िल्म बनी- एक ऐसी लड़की की कहानी जो बिना शर्त प्यार करती है और जब सामने वाला प्यार पर शर्त लगाता है तो अपनी मोहब्बत को बोझ न बनने देने का रास्ता भी अपने लिए ख़ुद चुनती है।

रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम


रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम लिखती हैं, “वो (साहिर) चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता। आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता। जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती। मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखती और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगती। जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकड़ती तो मुझे लगता कि मैं ‘साहिर’ के हाथों को छू रही हूँ। इस तरह से मुझे सिगरेट पीने की लत लगी।”


अमृता और साहिर का रिश्ता ताउम्र चला लेकिन किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा। इसी बीच अमृता की ज़िंदगी में चित्रकार इमरोज़ आए। दोनों ताउम्र साथ एक छत के नीचे रहे लेकिन समाज के क़ायदों के अनुसार उन्होंने कभी शादी नहीं की।
इमरोज़ अमृता से कहा करते थे- तू ही मेरा समाज है और ये भी अजीब रिश्ता था जहाँ इमरोज़ भी साहिर को लेकर अमृता का एहसास जानते थे।


इमरोज़ ने कहीं बताया था, “अमृता की उंगलियाँ हमेशा कुछ न कुछ लिखती रहती थीं… चाहे उनके हाथ में क़लम हो या न हो। उन्होंने कई बार स्कूटर पर पीछे बैठे हुए मेरी पीठ पर ” साहिर ” का नाम लिख दिया। लेकिन फ़र्क क्या पड़ता है। वो उन्हें चाहती हैं तो चाहती हैं, मैं भी उन्हें चाहता हूँ।”
इश्क़ की परिभाषा, मुहब्बत के मापदंड , दोस्ती के आयाम और साहित्य की बुलंदी समझाने वाली उस महान महिला को लाखों सलाम

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