अमन(शांति) पर शायरी

अमन (शांति) पर शायरी

अमन में हिस्सा छोड़ चुका हूँ
एक परिंदा छोड़ चुका हूँ
अक्स समस्ती पूरी
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अमन की कर ख़ैरात अता मेरे मौला
जंग-ओ-जदल को दूर हटा मेरे मौला
साहिल मुनीर
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कितना पुरअम्न है माहौल फ़सादाद के बाद
शाम के वक़्त निकलता नहीं बाहर कोई
इशरत धूलपूर
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अमन प्रचार तलक ठीक सही लेकिन अमन
तुमको लगता है कि होगा नहीं होने वाला
फ़सीह अल्लाह नक़ीब
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अमन हर शख़्स की ज़रूरत है
इस लिए अमन से मुहब्बत है
नामालूम

रहे तज़किरे अमन के आश्ती के
मगर बस्तीयों पर बरसते रहे बम
अनवर शऊर
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अमन कैफ़ी हो नहीं सकता कभी
जब तलक ज़ुलम-ओ-सितम मौजूद है
इक़बाल कैफ़ी
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अमन(शांति) पर शायरी


मिल के सब अमन-ओ-चीन से रहिए
लानतें भेजिए फसादों पर
हीरालाल फ़लक देहलवी
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सबसे पुरअम्न वाक़िया ये है
आदमी आदमी को भूल गया
जून ईलिया
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हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुलम के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही
साहिर लुधियानवी

जंग अफ़्लास और गु़लामी से
अमन बेहतर निज़ाम की ख़ातिर
साहिर लुधियानवी
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धूप के साये में चुप साधे हुए
कर रहे हो अमन का ऐलान क्या
आदिल हयात
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शायद कि सलीम अमन की सूरत नज़र आती
हम लोग अगर शोला-बयानी से निकलते
सलीम कौसर
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मुस्लिम मसीही हिंदू-ओ-सिख हैं बहुत मगर
दुनिया को अमन के लिए इन्सान चाहीए
मीदी बाक़िर ख़ान मेराज
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अमन(शांति) पर शायरी


अब वो दुनिया अजीब लगती है
जिसमें अमन-ओ-अमान बाक़ी है
राजेश रेड्डी

ये अमन की धरती है मगर आज यहां पर
तकरार का आलम है जिधर देख रहा हूँ
शादाब अंजुम
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अभी से अमन की ठंडक तलाश करते हो
अभी तो चमकी है यारो सलीब-ओ-दार की धूप
अली अब्बास उम्मीद
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है दुनिया को अमन-ओ-सिक्कों की ज़रूरत
करो ख़त्म तूफ़ाँ उठाने की बातें
वेद प्रकाश मलिक सरशार
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हमेशा अमन नहीं होता फ़ाख़्ताओं में
कभी-कभार उक़ाबों से भी कलाम करो
निदा फ़ाज़ली
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अब वो दिन दूर नहीं देखना तुम भी यारो
अमन के नाम पे क्या फितना बपा होता है
जाफ़र अब्बास

अमन की शाख़ पे बैठे हुए पंछी सारे
शर पसंदों की शरारत से दहल जाते हैं
शब्बीर अहमद शाद
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अमन(शांति) पर शायरी


हमारे शहर में सब ख़ैर-ओ-आफ़ियत है मगर
यही कमी है कि अमन-ओ-अमान कुछ कम है
मंज़र भोपाली
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यहां तो अमन-ओ-अम्मां से कई गुना ज़्यादा
पनप रहा है सुनो अमन और अमान का शोर
ज़ीशान साजिद
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फ़ितरतन हर आदमी है तालिब अमन-ओ-अम्मां
दुश्मनों को भी मुहब्बत की नज़र से देखिए
शकील बद एवनी
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गर्दने अमन पे दहश्त की छुरी है अंजुम
कौन ऐसे में फिर आवाज़ उठा सकता है
शादाब अंजुम

अमन कहते हैं जिसे रूह है आज़ादी की
एक आलम को ख़बरदार किया है हमने
नुशूर वाहिदी
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करना है अपने ग़म का अज़ाला भी ख़ुद हमें
बारिश ना होगी अमन की अब आसमान से
संजय मिसरा शौक़
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सुर्ख़ियाँ अमन की तलक़ीन में मसरूफ़ रहीं
हर्फ़ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच
मोहसिन नक़वी
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हम बहुत चाहते हैं अमन-ओ-मुहब्बत हरसू
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
अदील ज़ैदी

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