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अलीना इतरत की ग़ज़ल

aleena itrat
aleena itrat

शाम के वक़्त चिराग़ों सी जलाई हुई मैं
घुप अन्धेरों की मुन्डेरों पे सजाई हुई मैं


देखने वालों की नज़रों को लगूँ सादा वरक़
तेरी तहरीर में हूँ ऐसे छुपाई हुई मैं


ख़ाक कर के मुझे सहरा में उड़ाने वाले
देख रक़्साँ हूँ सरे दश्त उड़ाई हुई मैं


लोग अफ़साना समझ कर मुझे सुनते ही रहे
दर हक़ीक़त हूँ हक़ीक़त से बनाई हुई मैं


मेरी आँखों में समाया हुआ कोई चेहरा
और उस चेहरे की आँखों में समाई हुई मैं


कितनी हैरान है दुनिया कि मुक़द्दर की नहीं
अपनी तदबीर के हाथों हूँ बनाई हुई मैं


मेरे अन्दाज़ पे ता देर ‘अलीना’ वो हँसा
ज़िक्र में उसके थी यूँ ख़ुद की भुलाई हुई मैं
thinkerbabu

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