अखिलेश तिवारी की ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल

कवि: अखिलेश तिवारी,


करके सब उसके हवाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूं
कौन अक़्लो-दिल संभाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

वो मसाइल ज़ीस्त के हों या तसव्वुफ़ के बयान
कितने ही पन्ने खंगाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

घर की चीज़ों को समेटा और उन्हें तरतीब दी
कर लिए सब साफ़ जाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

क्या पता फिर मुब्तिला हो जाऊं कब जंजाल में
मुझको पाना हो तो पाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूं।

सच से फिर नज़रे चुराईं आईने से दूर रह
मसअले फिर कल पे टाले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

फड़फड़ाता था वो कबसे इक परिंदा बेतरह
तोड़कर माज़ी के ताले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

देखता हूँ धूप तितली फूल चिड़िया चांदनी
और बादल उजले-काले इन दिनों फ़ुर्सत में हूँ

ग़ज़ल


पहले नही हुआ था जो इस बार हो गया
अहसास अपनी राह की दीवार हो गया

कितने गुमां से कैसे बचा है यक़ी न पूछ
इन कोशिशों में क्या नही मिस्मार हो गया

किरदार अब चलन में है कम कम के जैसे वो
शोकेस में रखी हुई दस्तार हो गया

अब दिल तलाशता है तग़ाफ़ुल में लज़्ज़तें
दीवाना अक़्ल वालों में होशियार हो गया

फ़ुरसत न थी समेट के तरतीब दूं उन्हें
घर मे तमाम चीज़ों का अंबार हो गया

पाला था सौ जतन से मगर अब वही ख़याल
तन्हाइयों की क़ैद में ख़ूँख़ार हो गया

ग़ज़ल


अभी तो परछाईं है साथ
फिर क्या होगा उसके बाद
आएगी जब काली रात
फिर क्या होगा उसके बाद

किसका मज़हब कैसी ज़ात
फिर क्या होगा उसके बाद
शह में जब दिख जाए मात
फिर क्या होगा उसके बाद

पसमंज़र में हैं आंसू
धुंआ धुआं इस मंज़र में
थम जाएगी जब बरसात
फिर क्या होगा उसके बाद

रस्ता रस्ता तेरे साथ
अभी तो है दीवानापन
छोड़ दिया गर इसने हाथ
फिर क्या होगा उसके बाद

एक ख़मोशी सुनती है
दिल की धड़कन मगर अभी
शोर मचाएंगे जज़्बात
फिर क्या होगा उसके बाद

अंगड़ाई ले सुब्ह जगी
पर मौसम है सहरा का
जाने कब बदलें हालात
फिर क्या होगा उसके बाद

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