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अहमद सिदिक़ी की ग़ज़ल

ग़ज़ल
ग़ज़ल

ग़ज़ल

ये क़लम है इसे ख़ून पिला कर लिक्खें
वरना जाऐं किसी और से जा कर लिक्खें


हम सुख़न वाले सुख़न बेचते रहते हैं मगर
आपका क्या है इसे झूट बता कर लिक्खें


एक ही शख़्स है इस शह्र में भूका प्यासा
ऐसी ख़बरों से मियाँ आँख बचा कर लिक्खें


दुश्मनी मुझसे अगर आपको होती है तो फिर
मेरे माज़ी के वो अवराक़ जला कर लिक्खें


हम फ़की़रों की ये आदत नहीं होती अहमद
कार-ए-मरदूद को पाकीज़ा बना कर लिक्खें

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