झूठे आरोप पर शायरी

झूठे आरोप पर शायरी

तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम ना ढूंढ़ो
चाहा था तुम्हें इक यही इल्ज़ाम बहुत है
साहिर लुधियानवी

ऐ दोस्त कहीं तुझपे भी इल्ज़ाम ना आए
इस मेरी तबाही में तिरा नाम ना आए
हकीम नासिर

अपने सर तेरे तग़ाफ़ुल का भी इल्ज़ाम लिया है
ख़ुद-फ़रेबी का सितम दिल पे कई बार किया है
ज़हीर अहमद ज़हीर

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
दशनाम तो नहीं है, ये इकराम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब भी इल्ज़ाम मुहब्बत है , हमारे सर पर
अब तो बनती भी नहीं यार हमारी उस की
नामालूम

झूठे आरोप पर शायरी

हम पे तोहमत नहीं इल्ज़ाम लगा सकते हो
और इस काम से शौहरत भी कमा सकते हो
इमरान आमी

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं
दुनिया वाले दिल-वालों को और बहुत कुछ कहते हैं
हबीब जालिब

रह गए हैं जो इल्ज़ाम
वो मेरे कफ़न पे लिख देना

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझको तेरे नाम से पहचानते हैं
क़तील शिफ़ाई

तू कहीं भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है
तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम तो है
साबिर जलालाबादी

तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम ना ढूंढ़ो
चाहा था तुम्हें इक यही इल्ज़ाम बहुत है
साहिर लुधियानवी

लोग मुझ को ही अब इस पर इल्ज़ाम कर देते हैं
मुहब्बत क्यों ना की इस पर बदनाम कर देते हैं

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