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कब जागोगे!

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कब जागोगे!
कब जागोगे!

कब जागोगे!

कवि: मिन्हाज रिज़वी

रात मैं न्यूज़ देखते देखते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चला
यह रात मुझ पर बहुत भारी गुज़री
यह मेरा अंतर्द्वंद था कल्पना थी यथार्थ था या मात्र मेरा सपना
बहर हाल जो भी था भयावह था
स्शुरुआत महाभारत थी कुरुक्छेत्र का मैदान था दोनों ओर भाई थे लड़ाई का कारण सत्ता थी
मेरे चारों ओर भीषण युद्ध था
हर मरने वाला मेरा अपना और हर मारने वाला भी
मैं एक को रोकता तबतक चार हताहत हो गिरते
परन्तु इस युद्ध में लड़ने वाले न तो पांडव थे और न ही कौरव
वह तो बस दूर एक साथ खड़े तमाशा देख रहे थे
और मुझ जैसों का मज़ाक़ उड़ा रहे थे
जीत किसी की भी होती मरता कोई भी इससे उन्हें कोई सरोकार न था
उन्हें तो बस अपना सत्ता सुख भोगना था


मुझे दोनों पक्षों के बीच भारतमाता पांचाली के रूप में नज़र आईं जिनका चीरहरण हो रहा था
यह शायद मेरे सिवा किसी और को नज़र नहीं आरहा था
क्यूँ की क्रोध सिर्फ मुझे आ रहा था अपनी अपांग निरीह निर्बल काया पर
मैं चिल्ला रहा था दौड़ो आपस में मत लड़ो माता की अस्मिता बचाओ
मगर मेरी कौन सुनता सबके कानों में तो रणभेरी बज रही थी
सब शायद अंधे थे या देखना ही नहीं चाहते थे
मैंने सोंचा अब तो बस भगवन का आसरा है
मगर भगवान हैं कहाँ
शायद अर्जुन के रथ पर
तभी मुझे यद् आया रथ तो बस अयोध्या गया है


तो मैं विष्णु अवतार की तलाश मे अयोध्या की ओर निकल पड़ा
अयोध्या पहुंचा तो यहाँ का दृश्य भी कम दुखदायी नहीं था
यह तो राम की नगरी थी यहाँ तो रामराज होना था
परन्तु यह क्या स्वयं श्री राम यहां रक्त में डूबे बैठे थे
मुझसे रहा न गया
मैं पूछ बैठा
हे प्रभु यह क्या यह रक्त कैसा
प्रभु बोल पड़े यह रक्त मेरे पुत्रों का है जो आपस में लड़ बैठे हैं, मैंने पूछा लव? कुश?,
एक दुखभरी मुस्कान उनके अधरों पर तैर गई,
बोले यदि मैं राम हूँ और यह रामराज तो हर देशवासी मेरे पुत्र समान है,
मैंने कहा प्रभु आप तो भगवान विष्णु के अवतार हैं कुछ करते क्यूँ नहीं,


इस प्रश्न पर उनकी आँखों से आंसू छलक आए वह बोले क्यूँ की अब मुझ पर कोई विश्वास नहीं करता मेरी शक्ति तो भक्तों का विश्वास है,
विश्वास नहीं तो शक्ति नहीं, मैं चुप समझ में नहीं आरहा था क्या बोलूं कि तभी भगवन फिर बोल पड़े क्या तुम लंका जा सकते हो,
मैंने कहा अवश्य, वह बोले जाओ और देखो तुम्हें पता चल जाएगा कि लोगों का विश्वास मुझ पर क्यूँ कम हो रहा है,
मैंने चरण स्पर्श किये और लंका की ओर चलने लगा की तभी भगवन ने टोक दिया उधर कहाँ चले
आजकल लंका दिल्ली में है दिल्ली जाओ रावण भी वहीँ मिले गा और सीता भी,
हो सके तो उसे बचाने की कोशिश करना

,
अजीब बात थी किन्तु भगवान की वाणी थी तो मैं दिल्ली की ओर चल पड़ा,
सारे रस्ते मैंने अगर कुछ देखा तो महाभारत,
दिल्ली पहुंचा तो रावण को मैने एक सुन्दर भव्य महल में देखा
यदि उसके दस सर न होते तो मैं उसे पहचान नहीं पाता क्यूँ की उसने श्वेत आवरण धारण कर रखा था और काले धन की बात कर रहा था,
मैंने दहने बाएँ देखा तो एक ओर सारे देवी देवताओं का भोज चल रहा था,
यदि अयोध्या में श्रीराम के दर्शन न हुए होते तो मैं भी धोखा खा ही जाता,
क्यूँ की यहाँ भी एक मायावी श्री राम का रूप धारे भोज कर रहा था,
भगवन की बात अब मेरी समझ में आई, की आखिर इतने भक्तो के होते हुए भी बागवान को आस्था एवं विश्वास की कमी क्यूँ सता रही है,
इस बार रावण छल कर रहा है,
भगवान की शक्ति कम कर रहा है,


मैंने सोंचा अब मैं क्या करूँ तभी मुझे सीता मैया का ध्यान आया और मैं तुरंत उन्हें ढूँढने में लग गया,
वह मुझे मिलीं किन्तु अजब हाल में भारत माता के रूप में अपनी गोद में एक रक्तरंजित दिल लिए,
मैंने पूछा माते यह क्या?
वह बोल पड़ीं यह मेरे उस सुपूत का दिल है जिसे राक्षसों ने इस प्रकार तोड़ा है की उसका विश्वास मुझ पर से डोलने लगा है,
फिर बोलीं हर रोज़ यह मायावी राक्षस मेरे हजारों सुपूतों के विश्वास को आहात कर रहे हैं उनका विश्वास मुझ पर से डोल रहा है मेरा कवच्छ छिर्ण हो रहा है,
जाओ कुछ करो यदि एसा ही होता रहा तो मेरी अस्मिता धूमिल हो जाए गी,
मेरा मन उद्वेलित होने लगा माथे पर पसीना आगया जिह्वा शुष्क हो गयी मेरी नींद टूट गयी…….
आप कब जागेंगे ?

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