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आँखों पर शायरी

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तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो
तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है
मुनव्वर राना

लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझसे
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझसे
जांनिसार अख़तर

तेरी आँखों का कुछ क़सूर नहीं
हाँ मुझी को ख़राब होना था
जिगर मुरादाबादी

तेरे जमाल की तस्वीर खींच दूं लेकिन
ज़बां में आँख नहीं आँख में ज़बान नहीं
जिगर मुरादाबादी

आ जाये ना दिल आपका भी और किसी पर
देखो मेरी जां आँख लड़ाना नहीं अच्छा
भार तेंदू हरीशचंद्र

ख़ुदा बचाए तेरी मस्त मस्त-आँखों से
फ़रिश्ता हो तो बहक जाये आदमी किया है
ख़ुमार बारह बंकवी

जो इन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
फ़िराक़-गोरखपुरी

आँखों पर शायरी

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुमने देखा नहीं आँखों का समुंद्र होना
मुनव्वर राना

कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता
बशीर बदर

अब तक मेरी यादों से मिटाए नहीं मिटता
भीगी हुई इक शाम का मंज़र तेरी आँखें
मुहसिन नक़वी

आँखें जो उठाए तो मुहब्बत का गुमाँ हो
नज़रों को झुकाए तो शिकायत सी लगे है
जांनिसार अख़तर

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ
आँखें मेरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ
बशीर बदर

पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है
दुनिया तेरी आँखों को भी क्या-क्या ना कहे है
नामालूम

आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहिब
वो अलग बांध के रखा है जो माल अच्छा है
अमीर मीनाई

आँखों पर शायरी

किसी ने चूम के आँखों को ये दुआ दी थी
ज़मीन तेरी ख़ुदा मोतीयों से नम कर दे
बशीर बदर

इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में
आईने आँखों के धुँदले हो गए
नासिर काज़मी

हसीं तेरी आँखें हसीं तेरे आँसू
यहीं डूब जाने को जी चाहता है
जिगर मुरादाबादी

लड़ने को दिल जो चाहे तो आँखें लड़ाईए
हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो
लाला माधव राम जोहर

उसकी आँखों को ग़ौर से देखो
मंदिरों में चिराग़ जलते हैं
बशीर बदर

आँखें ना जीने देंगी तेरी बेवफ़ा मुझे
क्यों खिड़कियों से झांक रही है क़ज़ा मुझे
इमदाद अली बहर

इक हसीं आँख के इशारे पर
क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
अबदुलहमीद अदम

आँखों पर शायरी

आँख रहज़न नहीं तो फिर किया है
लूट लेती है क़ाफ़िला दिल का
जलील मानक पूरी

लोग नज़रों को भी पढ़ लेते हैं
अपनी आँखों को झुकाए रखना
अख़तर होशयार पूरी

इन रस-भरी आँखों में हया खेल रही है
दो ज़हर के पियालों में क़ज़ा खेल रही है
अख़तर शीरानी

आपकी मख़मूर आँखों की क़सम
मेरी मय-ख़्वारी अभी तक राज़ है
इसरार उल-हक़ मजाज़

जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं
ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं
अबदुलहमीद अदम

हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है
अख़तर अंसारी

रात को सोना ना सोना सब बराबर हो गया
तुम ना आए ख़ाब में ,आँखों में ख़ाब आया तो क्या
जलील मानक पूरी

आँखों पर शायरी

बुज़दिली होगी चराग़ों को दिखाना आँखें
अब्र छट जाए तो सूरज से मिलाना आँखें
शकील बद एवनी

कभी उन मदभरी आँखों से पिया था इक जाम
आज तक होश नहीं होश नहीं होश नहीं
जिगर मुरादाबादी

आँख से आँख जब नहीं मिलती
दिल से दिल हमकलाम होता है
इसरार उल-हक़ मजाज़

ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
तरी याद आँखें दिखाने लगी
आदिल मंसूरी

तलब करें तो ये आँखें भी उनको दे दूं मैं
मगर ये लोग इन आँखों के ख़ाब मांगते हैं
अब्बास रिज़वी

कैफ़ीयत चशम उस की मुझे याद है सौदा
साग़र को मेरे हाथ से लीजो कि चला मैं
मुहम्मद रफ़ी सौदा

आँखें ख़ुदा ने दी हैं तो देखेंगे हुस्न-ए-यार
कब तक नक़ाब-ए-रुख से उठाई ना जाएगी
जलील मानक पूरी

आँखों पर शायरी

मैं डर रहा हूँ तुम्हारी नशीली आँखों से
कि लूट लें ना किसी रोज़ कुछ पिला के मुझे
जलील मानक पूरी

मीर उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
मीर तक़ी मीर

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
ये मोतीयों की तरह सीपियों में पलते हैं
बशीर बदर

आँखें साक़ी की जब से देखी हैं
हमसे दो घूँट पी नहीं जाती
जलील मानक पूरी

ना वो सूरत दिखाते हैं ना मिलते हैं गले आकर
ना आँखें शाद होतीं हैं ना दिल मसरूर होता है
लाला माधव राम जोहर

आँखों में जो बात हो गई है
इक शरह हयात हो गई है
फ़िराक़-गोरखपुरी

अभी वो आँख भी सोई नहीं है
अभी वो ख़ाब भी जागा हुआ है
नसीर अहमद नासिर

आँखों पर शायरी

देखी हैं बड़े ग़ौर से मैंने वो निगाहें
आँखों में मुरव्वत का कहीं नाम नहीं है
जलील मानक पूरी

शाम से उनके तसव्वुर का नशा था इतना
नींद आई है तो आँखों ने बुरा माना है
नामालूम

मैं जिसकी आँख का आँसू था उसने क़दर ना की
बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे
बशीर बदर

आँखों से आँसूओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआँ
गुलज़ार

दिलों का ज़िक्र ही किया है मिलें मिलें ना मिलीं
नज़र मिलाओ नज़र से नज़र की बात करो
सूफ़ी तबस्सुम

जान से हो गए बदन ख़ाली
जिस तरफ़ तू ने आँख भर देखा
ख़्वाजा मीर दर्द

लोग करते हैं ख़ाब की बातें
हमने देखा है ख़ाब आँखों से
साबिर दत्त

इन झील सी गहिरी आँखों में
इक लहर सी हर-दम रहती है
रसा चुग़्ताई

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