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आदमी पर शायरी

आदमी पर शायरी
आदमी पर शायरी

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना
निदा फ़ाज़ली

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत उस की भी आदमी सी है
गुलज़ार

बस-कि दुशवार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
मिर्ज़ा ग़ालिब

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला
बशीर बदर

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इन्सान निकलते हैं
मीर तक़ी मीर

फ़रिश्ते से बढ़कर है इन्सान बनना
मगर इस में लगती है मेहनत ज़्यादा
अलताफ़ हुसैन हाली


मीर साहिब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियां
मीर तक़ी मीर

आदमी पर शायरी

मेरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मेरा एतबार मत करना
आसिम वास्ती

झूट बोला है तो क़ायम भी रहो इस पर ज़फ़र
आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहीए
ज़फ़र इक़बाल

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम
नामालूम

समझेगा आदमी को वहां कौन आदमी
बंदा जहां ख़ुदा को ख़ुदा मानता नहीं
सबा अकबराबादी

ज़फ़रध आदमी उस को ना जानिएगा वो हो कैसा ही साहिबे फ़हम-ओ-ज़का
जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा ना रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा ना रहा
बहादुर शाह ज़फ़र

जानवर आदमी फ़रिश्ता ख़ुदा
आदमी की हैं सैकड़ों किस्में
अलताफ़ हुसैन हाली

सबसे पुरअम्न वाक़िया ये है
आदमी आदमी को भूल गया
जून ईलिया

आदमी पर शायरी


राह में बैठा हूँ मैं, तुम संग-ए-रह समझो मुझे
आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद
बीख़ोद देहलवी

ख़ुदा से बे मुहब्बत कर सकेगा
जिसे नफ़रत है उसके आदमी से
नरेश कुमार शाद

हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ायब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
शहज़ाद अहमद

दुनिया पे ऐसा वक़्त पड़ेगा कि एक दिन
इन्सान की तलाश में इन्सान जाएगा
फ़ना निज़ामी कांपूरी

आदमी बुलबुला है पानी का
क्या भरोसा है ज़िंदगानी का
मौलवी अब्दुलरज़ा रज़ा

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