सामाजिक निगरानी कारागार की तरह होती है

सामाजिक निगरानी कारागार की तरह होती है

By रचना त्यागी

समाज यह चाहता है कि स्त्रियों की पूरी जिंदगी – जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर – उसकी निगरानी में ही बीते। यही कारण है कि समाज की ज्यादातर परम्पराएं आज भी उतनी ही प्रभावी हैं, जितनी चार-पांच दशक पहले थीं। हाँ, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि शिक्षा के विकास से थोड़ा बदलाव हुआ है, लेकिन उतना नहीं, जितना होना चाहिए था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि चाहे शहर की पढ़ी-लिखी महिलाएं हो या गांव की घरेलू कामकाजी महिलाएं, आज भी उन्हें अपने रिश्तों के लिए, परम्परा के लिए ही जीवन जीना होता है। वे कभी भी अपने लिए जी ही नहीं पातीं। इसे समझने का सबसे सार्थक मापदण्ड यह समझना है कि एक औरत को अपनी जिंदगी में कितनी बार अपने स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता है, उसे अपने कितने सपनों को त्यागना पड़ता है! ऐसा इसलिए, कि परिवार बिखर न जाए, परिवार को जोड़े रखने, परिवारिक दायित्व निभाने की उसकी क्षमता पर कोई अंगुली न खड़ा कर दे।


अब यहां ‘परिवार’ के अर्थ को समझना भी जरूरी है। स्त्री के लिए शादी से पहले परिवार का मतलब ‘मां-बाप और भाई-बहन की तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठा’ होती है जिसे कायम रखने की पूरी जिम्मेदारी घर की स्त्रियों पर ही होती है। शादी के बाद परिवार का अर्थ ‘पति और ससुराल की तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठा’ होती है। इसे भी बरकरार रखने की पूरी जिम्मेदारी बहू, यानी औरतों पर ही होती है, और औरतों की ज़रा-सी स्वतंत्रता पर इनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ जाती है।


यह सच है कि अब गांव-गांव में लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है। नौकरी के मामले में अब महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। फिर भी महिलाएं स्वतंत्र नहीं है क्योंकि आज भी लड़कियों की पारिवारिक परवरिश में उन्हें हमेशा पुरुषों की अधीनता को स्वीकार करना ही सिखाया जाता है। लड़कियों को ‘लोग क्या कहेंगे ?” का मंत्र सबसे पहले परिवार से ही मिलता है, जो आगे चलकर शोषण में बदल जाता है। जबकि होना यह चाहिए, कि माँ-बाप को बचपन से ही लड़कियों को यह भी सिखाना चाहिए कि अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का उन्हें भी हक है।  

दिल्ली सरकार के ‘राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय,आई एन ए कॉलोनी’ में हिंदी शिक्षिका के पद पर कार्यरत रचना त्यागी का साहित्य और कला के क्षेत्र से गहरा लगाव है। कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, लेख, समीक्षाएँ, उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार आदि प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने ‘सिद्धान्त फाउंडेशन’ नाम की एक संस्था की भी स्थापना की है, जो जीवन-पर्यन्त अपने साहित्यिक-कलात्मक अवदान से समाज को समृद्ध करने के बाद जीवन की साँझ में आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहे कलाकारों, साहित्यकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।  

हमारे समाज में परम्पराओं के नाम पर जो अविवेकी सोच सदियों से चली आ रही है, उनकी बेड़ियाँ तोड़ना, उनके जंग लग चुके दायरों से बाहर निकलना बेहद ज़रूरी है। जब तक यह नहीं होगा, स्थिति नहीं बदलने वाली। आज भी अच्छे-ख़ासे सुशिक्षित परिवारों में सबसे महत्वपूर्ण और भारी ज़िम्मेदारी लड़की की शादी ही मानी जाती है, जिसकी तैयारी उसके जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है। हर क़दम पर लड़की की परवरिश को यही सोच संचालित करती है, कि इसे एक दिन दूसरे घर जाना है, एक गृहस्थी संभालनी है। उस परीक्षा के लिए उसे घोट-घोटकर तैयार किया जाता है। मज़े की बात ये, कि इतने पर भी कहीं न कहीं उसकी शादी की असफलता का डर इस क़दर खाये जाता है, कि लड़की के ताउम्र प्रशिक्षण के बाद भी उसकी शादी में हैसियत से बढ़कर ताम-झाम करने की ज़रूरत महसूस होती है, चाहे उसके लिए अपने अन्य ज़रूरी ख़र्चों में कटौती करनी पड़े, या कर्ज़ा लेना पड़े। यदि इतनी ही शिद्द्त से लड़की की शिक्षा-दीक्षा और परवरिश पर ख़र्च किया जाये, उसे मानसिक और बौद्धिक रूप से इतना परिपक्व बनाया जाये कि वह अपने विवाह और व्यवसाय संबंधी अहम निणर्य ख़ुद ले सके, तो माता-पिता न सिर्फ़ लड़की की शादी की तमाम आडंबरपूर्ण परेशानियों से बच सकते हैं, बल्कि उस शादी की सफलता (यदि वह शादी करना चुनती है, तो) की संभावना भी कहीं अधिक होगी।

सिद्धांत फाउंडेशन द्वारा आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में कहानी चर्चा..

स्त्री-चेतना के प्रति हमेशा सजग रहने वाली रचना त्यागी अपनी स्कूली लड़कियों को भी आत्मनिर्भर बनने, मेहनत से पढ़ने और अपने बारे में खुद निर्णय लेने की प्रवृत्ति पैदा करने के लिए जागरूक करती रहती हैं। वे क़िताबी पढ़ाई से अधिक महत्वपूर्ण व्यावहारिक चेतना और जागृति को मानती हैं। वे अपने छात्र-छात्राओं को अंधविश्वासी परम्पराओं पर सवाल करने, और अपने परिवार और परिवेश की महिलाओं को प्रताड़ित होने से रोकने के लिए प्रेरित करती आई हैं। आज वो कई लड़कियों के लिए आदर्श हैं। उनकी काउंसलिंग के कारण कई नाबालिग लड़कियों ने शादी करने के बजाए पढ़ाई की राह चुनी है।

जो लोग हमारे समाज में शादी-समारोहों के भारी -भरकम आडंबर में भागीदार बनते हैं, उस समारोह में गठबंधन में प्रवेश करने वाले युग्म के जीवन में आने वाली परेशानियों को सुलझाने में उनका कोई हाथ नहीं होता। वे सिर्फ़ कुछ घण्टों के लिए एक तमाशबीन की भूमिका में होते हैं। फिर क्या मतलब है वहाँ इतना धन और ऊर्जा व्यय करने का, जो उस रिश्ते की सफलता की कोई गारण्टी नहीं देता। बल्कि कई मामलों में लड़की के माता-पिता ख़ुद को ठगा महसूस करते हैं कि जीवन भर की जमा-पूँजी लड़की की शादी में लगा देने के बावजूद उसकी शादी या जीवन को बचा नहीं पाए। यहीं नाल है इस समस्या की। 

रचना त्यागी


हमारे समाज को लड़की या स्त्री की समझ पर भरोसा करना सीखना होगा। उसके स्वतंत्र अस्तित्व की ज़रूरत को स्वीकारना होगा। आदर्शों और परम्पराओं का ठीकरा उसके सिर से हटाना होगा। सामान्यतया, एक पिता को आदर्श ‘बेटी’ चाहिए, एक पति को आदर्श ‘पत्नी’ और बच्चों को आदर्श ‘मां’!  और इस बीच उस औरत से उसका खुद का जीवन छीन लिया जाता है, जिसकी भनक किसी को नहीं लगती। यही स्थिति घातक है। इससे बाहर निकलने के लिए ख़ुद स्त्री को, और उसके परिजनों को ही क़दम उठाने होंगे। समाज में बदलाव तभी आएगा। कोई भी बदलाव छोटे से बड़े दायरे की ओर गति करता है। जब पारिवारिक स्तर पर पहल होगी, तो सामाजिक स्तर पर स्वतः ही होगी।

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