लोग मेरा जितना मजाक बनाते गए मैं उतनी ही मजबूत होती चली गयी

By स्वीकृति

बचपन से ही मुझे जानवरों से लगाव है। शादी के बाद जब मैं स्थायी रूप से हाजीपुर रहने लगी तब गली के लावारिस कुत्तों की सेवा की इच्छा प्रबल हो गई। पति और ससुराल वालों के सहयोग ने मुझे एक नई उम्मीद दी और फिर मैंने अपने आस पास के कुत्तों को भोजन देना शुरू किया। बीमार पड़ने पर उनका इलाज एवं सेवा करना शुरू किया। 

मैंने शादी के तुरंत बाद ही काम करना शुरू कर दिया। लेकिन सब कुछ इतना आसान न था। बिहार जैसे पिछड़े इलाकों में नई बहु के प्रति लोगों की परंपरागत सोच रहती है कि वह ससुराल आते ही सास-ससुर एवं परिवार की सेवा में लग जाए तथा  घर का चिराग लाए। लोग बात-बात पर बहुओं के व्यक्तित्व की समीक्षा करने लग जाते हैं। उस कठिन परिस्थिति में मैं जब कुत्तों एवं उनके बच्चों की देख रेख करती थी तो लोगों के लिए यह बिल्कुल नया और कौतूहल का विषय था।शादी के चार साल बाद मुझे बेटी हुई। इस बीच में मोहल्ले वाले बरबस ताना मारा करते, कहते थे कि “खुद को तो कोई संतान नहीं है अब चली कुत्तों के बच्चे को पालने”! तो कोई कहता “खुद के बच्चे तो होते नहीं, कुत्तों के बच्चे के जन्म की खुशी में पार्टी दे दो”! लोग मेरे ऊपर छींटाकसी करते थे। जब लोगों को यह एहसास हो गया कि यह लावारिस बेजुबान कुत्तों की सेवा करती रहेगी तो मुझे दिखा कर कुत्तों के साथ और ज्यादा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। यह लोगों का मुझे चिढ़ाने का सबसे क्रूरतम तरीका रहा। 

मैं अपने घर के नीचे की गली में ही कुत्तों के रहने, खाने की व्यवस्था करती हूँ। जब उनके बच्चे होते हैं तो मेरी ज़िम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है। लेकिन घर वालों के सहयोग से मैं लोगों की बातों को अनसुना कर के अपने काम में लगी रही। यह क्रम ऐसे ही चलता रहा। अचानक मार्च 2020 में कोविड-19 के कारण पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा हो गई। तब मैं इन बेजुबानों के भोजन के विषय में गंभीरतापूर्वक सोचने लगी। मेरे साथ कुछ और लोग मदद करने के लिए आगे आए।

मैंने अपना दायरा बढ़ा कर काम करना शुरू किया। श्वानों को खाना खिलाने के समय ही जो भी बीमार दिखता  या किसी को गंभीर जख्म रहती है तब हम उसी समय कोशिश करते है कि उसको इलाज़ मिले। अब कुछ लोग मुझे पशु प्रेमी के रूप में पहचानने लगे। वक़्त बढ़ता रहा और वक़्त के साथ परिस्थिति में कुछ बदलाव आया। लेकिन बेजुबान जीवों के प्रति लोगों की मानसिकता कमोबेश आज भी वही है।

अचानक 7 जुलाई को मेरे पास हाजीपुर के रामाशीष चौक स्थित रेलवे कॉलोनी निवासी एक व्यक्ति का कॉल आया। मुझे बताया गया कि कॉलोनी के कुछ लोग कॉलोनी में ही रहने वाले लावारिस कुत्तों को गैरकानूनी तरीके से एक वैन में लोड करके भगा रहे हैं। उन्होंने मुझसे सहायता मांगी। अपने टीम के अन्य सदस्यों के साथ  वहां पहुँचकर लोगों को पशु कानूनों और पशु के अधिकार के बारे में समझाया। उसी समय वहाँ स्थानीय मीडिया के कुछ लोग आ गए। कॉलोनी के कुछ सदस्यों ने उन श्वानों को एन्टी रेबीज इंजेक्शन की मांग रख दी जिसे हमारी टीम ने पूरा किया।

स्वीकृति

यह बात पूरे शहर में फैल गई। शहर के विभिन्न हिस्सों से गली के कुत्तों को एन्टीरैबीज वैक्सीन देने के लिए कॉल आने लगा। हमने कई गैर सरकारी संगठनों एवं शहर में स्थित पशु अस्पताल से सम्पर्क किया। मगर कहीं से कोई बात नही बनी। अब यह काम हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।  विडम्बना तो देखिए आज तक मदद करने के लिए एक भी इंसान तैयार नहीं हुआ पर हमारी आलोचना करने और उपहास करने से कुछ लोग आज भी पीछे नहीं हटते! लेकिन इन बातों से अब मेरे उत्साह में कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैंने खुद से वादा किया है कि अपनी क्षमता के अनुसार जब तक संभव हो पशु सेवा जारी रखेंगे।

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