लैंगिक समानता – सहस्राब्दी का सबसे बड़ा मिथक

By ऋत्विका बनर्जी

आजादी के सात दशक से भी ज्यादा समय गुजर चुका है। राजनीति,विज्ञान,अर्थव्यवस्था सहित अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र भारत ने एक लंबा सफर भी तय कर लिया है। ऐसे में यह जानना लाजमी है कि दुनिया को ‘आजादी’ के जरूरत को समझाने वाले हमारे देश में यहां की महिलाएं आज खुद कितनी आजाद हैं! देश की महिलाओं के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हैं? इस गुत्थी के हकीकत को समझना अनिवार्य है क्योंकि यह देश की आधी आबादी से जुड़ा मसला है। मैं अभी यहां कोई जटिल, पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परम्परागत प्रथाओं के जरिये समाज में महिलाओं की स्थिति की चर्चा नहीं करना चाहती हूँ। क्योंकि भले ही इस तरह के रिवाज समाज से खत्म न हुई हो लेकिन इसका विरोध नारीवादियों के द्वारा तो हो ही रह है, इन परम्पराओं में छुपे ‘पितृसत्तात्मक सोच’ को सार्वजनिक तौर पर गलत कहा ही जा रहा है। इसलिए मैं यहां समाज में मौजूद वैसे सामान्य ‘चलन’ के बारे में चर्चा करना चाहती हूँ जो भले ही साधारण तौर पर पितृसत्तात्मक सोच न लगे लेकिन असल में इस तरह के ‘चलन’ में मौजूद विचार महिलाओं के ‘गुरुत्व’ को नजरअंदाज कर के ही अस्तित्व में आया है। और इसे अभी न रोका गया तो यह एक परम्परा म स्वरूप धारण कर लेगा।

उदाहरण के लिए, देश भर में अधिकांश दुर्गा पूजा या काली पूजा समितियों में, अध्यक्ष और उनकी समिति के सदस्य मुख्य रूप से पुरुष होते हैं। केवल कुछ मुट्ठी भर क्लबों ने पूजा और संबंधित गतिविधियों के प्रबंधन के लिए एक ‘लेडी लीडर’ घोषित किया है। महिलाओं को किसी बड़े सार्वजनिक आयोजनों को आयोजित करने में असमर्थ समझा जाता है। यह मान लिया जाता है कि महिलाएं  बड़े आयोजनों के जटिल गतिविधियों, व्यापक पैमाने पर होने वाली खरीदारी, विक्रेता प्रबंधन आदि  के लिए योग्य नहीं हैं। अगर  अवसर मिलने पर वो ऐसा कर दिखाती भी हैं तो समाज द्वारा इसका श्रेय आयोजन में पुरुषों को दिया जाता है।

अंग्रेजी और बंगाली भाषाओं  की जानी-मानी साहित्यकार ऋत्विका बनर्जी साइबर सुरक्षा के जानकार हैं तथा वर्तमान में ग्लोबल क्लाइंट इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी लीड के रूप में उत्तर अमेरिकी समूह से जुड़ी हुई हैं।  बहुमुखी प्रतिभा की धनी ऋत्विका साइबर सुरक्षा जैसे जटिल तकनीकी मामलों के जानकार होने के साथ-साथ फिल्म-निर्माण, तथा साहित्य लेखन से भी जुड़ी हैं। एक द्विभाषी लेखिका के रूप में उन्होंने अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान स्थापित की है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या दस है। ये हैं: फैंटास्टिक 40, जेनोवा 20, भंगा मोनेर डिंगा, कडल एंड क्लैश, एंटा हबीबी, साइबर सिक्योरिटी एट योर फिंगर टिप्स, ट्रैवल टेल्स: बंगाल ऑन व्हील्स, जेनोवा-द बेस्ट ऑफ ऋत्विका, ट्रैवल टेल्स: मिस्टिक हिमालय एंड द सीक्रेट मर्डर सिराज-उद-दौला का गवाह (जो बंगाल नवाबों की सच्ची घटनाओं से प्रेरित एक ऐतिहासिक उपन्यास है) 2021 में जारी किया गया। उनकी बंगाली ऑडियो कहानियां नियमित रूप से भारत के प्रतिष्ठित एफएम स्टेशनों पर प्रसारित की जाती हैं।

जब भी श्रम की हिस्सेदारी की बात हो महिलाओं की बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी होती है। लेकिन जब नेतृत्व करने की बात हो तब उन्हें अयोग्य मानकर पीछे ढकेल दिया जाता है। बिडम्बना तो देखिए! देवता के पवित्र प्रसाद और भोग को अक्सर एक सम्मानित महिला द्वारा तैयार किए जाने की उम्मीद की जाती है, हालांकि वह देवता को छूने की हकदार नहीं है क्योंकि शास्त्र कहते हैं, “महिलाओं के शरीर अशुद्ध हैं क्योंकि वे मासिक धर्म से गुजरती हैं।” – और हम 21वीं सदी में एक स्वतंत्र देश में रहते हैं!

कॉरपोरेट्स की बात करें तो, हम जानते हैं कि महिलाएं वर्तमान में 26 सप्ताह के सवैतनिक मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। हालांकि, कुछ कम्पनियों को छोड़कर पुरुष कर्मचारियों को शायद ही कोई पितृत्व अवकाश मिलता है। यदि हां, तो किसी भी भारतीय कॉरपोरेट फर्म में यह 10 दिनों से अधिक नहीं है। …तो क्या यह मान लिया जाए कि बच्चों की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ मां की  है या क्या मां बच्चे के जन्म के 10 दिन बाद शारीरिक तथा मानसिक तौर पर इतने आत्मनिर्भर हो जाती हैं कि पिता सामान्य दिनचर्या में वापस कार्यालय में शामिल हो सकें? आइए एक और उदाहरण लेते हैं। जब एक महिला कर्मचारी मातृत्व अवकाश से वापस आती है, तो उसे वर्तमान और पिछले वर्ष के कार्यो के आधार पर आंका जाता है। उसकी 26 सप्ताह की मातृत्व अवकाश दो मूल्यांकन वर्षों में फैली हुई थी। 

अपनी असाधारण लेखन प्रतिभा के बदौलत दुनिया भर में शोहरत बटोरने वाली ऋत्विका बनर्जी अब तक  पंद्रह से अधिक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। इनमें से, उल्लेखनीय पुरस्कार हैं: सर्बिया से “अपोलो सिर्मिएन्सिस अवार्ड-2021”, साहित्य और शिक्षा क्षेत्र में “पद्म श्री अवार्ड-2020” के लिए नामांकन, यूएसए से “ग्लोबल ऑथर ऑफ द ईयर 2018”, “स्वामी विवेकानंद एक्सीलेंस अवार्ड-2019” सेवा यूथ गिल्ड द्वारा प्रायोजित भारत सरकार द्वारा, हेलो हेरिटेज सोसाइटी, भारत में पश्चिम बंगाल द्वारा “सिस्टर निवेदिता अवार्ड-2019”, अर्पिता फाउंडेशन, मथुरा, भारत से साहित्य में “नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर अवार्ड-2020”, और “इंटरनेशनल” आइकॉन ऑफ लिटरेचर” कंटेम्परेरी लिटरेरी सोसाइटी ऑफ उत्तर प्रदेश इन इंडिया द्वारा।

मातृत्व अवकाश लेने का मतलब अच्छे काम के वावजूद न पदोन्नति, न वेतन वृद्धि न ही प्रशंसा।  मानो मां बनना कारपोरेट कल्चर में अपराध हो।  नतीजन गर्भावस्था के सभी दर्द और थकान को सहते हुए महिला कर्मचारी जल्द से जल्द काम पर वापस जाना चाहती है। इस वक्त उनके पूर्व के  योगदान को भुला दिया जाता है।  क्या हम उसकी कड़ी मेहनत को केवल इसलिए नज़रअंदाज कर सकते हैं क्योंकि वह अपने गर्भ में एक बच्चे के जन्म के कारण पूरे वित्तीय वर्ष के लिए कंपनी की सेवा नहीं कर सकी? क्या उसकी डिलीवरी की तारीख पर उसका नियंत्रण है?  वही देश कहता है, मातृत्व एक महिला का जन्मसिद्ध अधिकार है।  लैंगिक समानता की वकालत करने वाला हमारा कारपोरेट जगत महिला कर्मचारियों के प्रति ऐसी सोच रखती हैं, तो हम कभी भी एक राष्ट्र के रूप में प्रगति नहीं कर सकते।

हमारे जैसे बढ़ते हुए तीसरे विश्व के देश में, महत्वाकांक्षा की स्वतंत्रता शायद विचारों की स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है। तीसरी दुनिया के हिस्से में जितने भी देश आते हैं वहां आज भी मानो महिलाओं को महत्वाकांक्षी होना अपराध है। उनको अपने लिए सपनें देखने का कोई अधिकार नहीं है, उन्हें पुरुषों की आंखों के दायरे में ही सपने देखने होते हैं। उनकी शरीर, उनके विचार, सपनें सभी सामाजिक निगरानी से ही नियंत्रण होनी चाहिए। हालांकि यह मानसिकता कोई नई नहीं है। सदियों पुरानी है। लेकिन महिला साक्षरता,  पढ़ाई-लिखाई, नौकरी आदि में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी के बीच यह पुरानी सोच आज भी जस का तस कायम है।

अब समय आ गया है कि हमारे देश की महिलाओं को उठ खड़ा होना चाहिए और समानता के लिए आवाज उठानी चाहिए। पश्चिम की तरह प्रगति करने के लिए हमें सबसे पहले पश्चिमी लोगों की तरह सोचना होगा। तभी कोई राष्ट्र सही मायने में स्वतंत्र हो सकता है।

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