योग एवं ध्यान : मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आज की आवश्कता

आज कोरोना जैसी भीषण महामारी से जूझने के बाद लोगों के लिए अब स्वयं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए जागरुकता अत्यंत आवश्यक हो गई है साथ ही साथ जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण एवं एक आध्यात्मिक सोच का  विकास भी एक अच्छा प्रयास हो सकता है जीवन को बेहतर बनाने के लिए।

योग एवं मेडिटेशन या ध्यान आज बेहतर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे लोकप्रिय प्रामाणिक एवं सुझवित  उपायों में से है। आज का भयावह समय जिसने हम सबको अपने घरों में कैद रहने को मजबूर कर दिया है और हम सबको बेहतर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पाने के कुछ बेहतर एवं प्रभावकारी उपायों पर फिर से विचार करने पर विवश कर दिया है तो ऐसे समय में दूर दूर तक विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन योग, योगासन एवं ध्यान का कोई दूसरा विकल्प नहीं समझ आता है।


योग प्रणाली एवं योगाभ्यास का उद्गम भारत में ही हुआ था।महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत योग सूत्र एवं अष्टांग योग को इसका मूलभूत आधार माना जाता है। हालांकि महर्षि पतंजलि के भी पहले से आध्यात्मिक उन्नति के लिए योग प्रणालियों का अस्तित्व था। परन्तु महर्षि पतंजलि ने जिस विधवत तरीके से उसकी व्याख्या की है एवं इसे लिपिबद्ध किया है उसके कारण ये और भी आम जनमानस की समझ के लिए सुलभ हो गए है।


योग आसानो के अलावा ध्यान अष्टांग योग का एक प्रमुख भाग है। यूं तो विश्व के कई हिस्सों में मेडिटेशन के कई  अन्य प्रारूप पाए जाते है जैसे की जापान एवं कई अन्य बुद्धिस्ट देशों में परन्तु मूल रूप से इस प्रकार की ध्यान परंपरा का विकास  बौद्ध धर्म के विश्व के विविध हिस्सों में प्रचार एवं प्रसार के कारण संभव हो पाया।


 यदि योग एवं ध्यान के क्षेत्र में भारतीय योगदान कि बात की जाए तो पूरा का पूरा योग एवं ध्यान की अधिकांश विधियां भारत की ही देन है। योग एवं ध्यान भारत की अतिप्राचीन आध्यात्मिक संस्कृति एवं परंपरा का हिस्सा रहे है। योग एवं ध्यान की परंपरा को आध्यात्मिक साधना एवं परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग माना जाता था एवं ये आध्यात्मिक साधकों के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया होती थी । योग एवं ध्यान के द्वारा प्राप्त होने वाला शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य इसका एक सहज ही परिणाम होता था।  आज के  आधुनिक युग में  उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति में जबरदस्त परिणामों को देखते हुए अब ये दुनिया भर में अत्यंत लोकप्रिय हो गए है। भगवत गीता में भी योग के मुख्यतया चार प्रकार बताए गए है


कर्म योग …निष्काम कर्म के द्वारा चेतना कि उच्च अवस्था तक पहुव जाना
ज्ञान योग …..जीवन एवं जगत के बारे में तात्विक ज्ञान प्राप्त करते हुए चेतना की उच्च अवस्था तक जाना
भक्ति योग….भजन पूजन कीर्तन मंत्र जप के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति
ध्यान योग…..गहन ध्यान के विविध प्रयोगों से  समाधि कि उपलब्धि
योग के कुछ अन्य प्रकार है
सांख्य योग….कपिल मुनि द्वारा प्रणीतहठ योग…. हठ योग प्रदीपिका इसक मुख्य ग्रंथ हैराज योग…यह कई योग एवं ध्यान प्रविधियों का मिला जुला उन्नत रूप हैमंत्र योग….इसमें मंत्रोच्चार  की प्राथमिकता  रहती है..

पतंजलि के अष्टांग योग में वर्णित है….
यम…आत्म नियंत्रण नियम ..धार्मिक  नियमों का अनुसरण आसन ..शारीरिक मुद्रा प्राणायम…श्वास नियंत्रण  प्रत्याहार …..इन्द्रिय विच्छेद  ध्यान ….गंभीर चिंतन  धारणा…एकाग्रता  समाधि…..ज्ञान की अवस्था

ध्यान

प्राचीन काल से भारत में ध्यान की कई कई विधियां प्रचलित रही है…जिनमे से कुछ निम्न लिखित है…
त्राटक ध्यानकुण्डलिनी योग एवं ध्यानक्रिया योग ध्यानसक्रिय ध्यानशांभवी महा मुद्रा सोहम  ध्यान
प्राचीन समय में भगवान बुद्ध द्वारा प्रणीत
 विपश्यना ध्यान आनापान सती ध्यान 

आधुनिक समय में कई सदगुरुओं आध्यात्मिक सदगुरुओं ने भी ध्यान की की विधियों को आज के आपाधापी वाले जीवन ने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए आविष्कार किया है….जो ध्यान की प्राचीन मूलभूत प्रविधियों पर आधारित है…..जैसे…
महर्षि महेश योगी द्वारा प्रणीत अनुभावतित ध्यान  Transendental मेडिटेशन
श्री श्री रविशंकर द्वारा प्रणीत सुदर्शन क्रिया जिसके देश एवं विदेश में करोड़ों साधक है
सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा प्रणीत ईशा क्रिया
योग एवं ध्यान की सभी तकनीके एवं विधियां पूरी तरह वैज्ञानिक मापदंडों पर खरी उतरती है।
पाश्चात्य देशों के की वैज्ञानिक के द्वारा काफी लंबे समय से लगातार योग एवं ध्यान से प्राप्त होने वाले शारीरिक एवं मानसिक लाभ पर सैकड़ों शोध किए गए है एवं आज भी शोध जारी है।

विजय लांजेवार (कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट)

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