भाषागत दूरी को सहज की खत्म कर देती है भक्ति

मनुष्य अपने जीवन की सभी गुत्थियों को अपनी मेहनत के बल पर सुलझाना चाहता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि मनुष्य में कर्म करने का गुण पाया जाता है। लेकिन हर किसी के जीवन में कुछ ऐसे मोड़ आ जाता है जब उसकी खुद की समझ, मेहनत धरी की धरी रह जाती है और वह कुछ भी न कर सकता है। फिर उस बेबश, लाचार इंसान को भगवान या किसी अलौकिक शक्ति के सहारे की जरूरत महसूस होती है। यह वह स्थिति होती है जब इंसान में भक्ति और श्रद्धा का भाव जगता है। सबसे खास बात यह है कि भक्ति और श्रद्धा का यह भाव जन्मगत बन्धनों को भी तोड़ देता है। यही कारण है कि आप को ऐसे लोगों के बारे में सुनने को मिलता है कि इंसान को उस धर्म के प्रति भी आस्था जग जाती है जिस धर्म में उसका जन्म नहीं हुआ है।

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यही कारण है कि हमारे कई धर्मग्रंथों का उर्दू में अनुवाद हुआ है । और, इसे वो लोग श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं जिनकी जुबान उर्दू की है, वो संस्कृत नहीं पढ़ पाते हैं। हमारे कई धर्मग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद किया गया है।

मुगल बादशाह अकबर ने ‘रामायण’ का फारसी अनुवाद करवाया था। अकबर के बाद हमीदाबानू बेगम, रहीम और जहाँगीर ने भी रामायण का अपनी जुबान में अनुवाद करवाया। बादशाह अकबर के द्वारा करवाई गई फ़ारसी अनुवाद की पांडुलिपि दौलताबादी कागज़ पर लीखी गई हैं। इस फ़ारसी रामायण में 364 पन्ने हैं तथा 176 मनोहारी चित्र हैं। इन चित्रों से मुगलकालीन कला का प्रमाण भी मिलता है। इस सचित्र रामायण में चित्रकारों का नाम भी लिखा हैं। मुख्य चित्रकार बासवान, केशव, लाल और मिस्कीन को माना जाता हैं।राजस्थान की राजधानी जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय में यह अनुवादित रामायण रखा गया है।

रामायण के साथ साथ महाभारत, गीता तथा कुछ पुराणों का भी कई मुगल बादशाहों ने अपनी जुबान में अनुवाद करवाया था।

फोटो : साभार गूगल

बात सिर्फ मुगलकाल की नहीं है, गौरतलब बात यह है कि आज भी हमारे धार्मिक ग्रन्थों का दूसरी भाषाओं में खासकर उर्दू, अरबी फारसी में अनुवाद होता है। श्री हनुमान चालीसा का भी अनुवाद कराया गया है ताकि ‘अवधी’ को नहीं पढ़ सकने वाले लोग भी श्री हनुमान चालीसा पढ़ सकें।

कट्टरता की नजरिए से अनुवाद करवाने की पहल और आज तक अनुवाद करवाने की चली आ रही परम्परा को नहीं समझा जा सकता है।

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