पुरुषों के कठपुतली बन राजनीति न करें महिलाएं

By कुमारी रिकू

महिलाओं के लिए तो कदम-कदम पर समस्या होती है।  साधारण परिवार की महिलाओं के लिए राजनीति में आना तो और भी कष्टदायक है। अपनी मेहनत से अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होता, और चुनावी राजनीति की राह तो और भी कठिन होता है। मैंने अपने क्षेत्र इन  स्थानीय राजनीति में जितनी महिलाओं को देखा है उनमें अधिकांशतः महिला अपने पति या पिता के हाथों की कठपुतली रहती है। महिलाएं सिर्फ मुखौटा बनी रहती है और उनके पति राजनीति करते हैं। ऐसे में महिला प्रतिनिधि होने के बाद भी महिलाओं की कोई बात नहीं सुनता, उनकी प्रगति नहीं होती। इसलिए मैंने राजनीति में जाकर खुद नेतृत्व करने का निर्णय लिया है।  

कुमारी रिकू गया जिले के महासचिव (जदयू) हैं तथा इस बार के स्थानीय चुनाव में कोंच उत्तरी जिला परिषद संख्या 01 के उम्मीदवार भी हैं। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि की कुमारी रिंकू इसबार कोंच की सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार मानी जा रही हैं।



मुझे इस बात का एहसास है कि महिलाओं की समस्या का समाधान महिला नेतृत्व से ही सम्भव है। इसलिए हमारे मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने स्थानीय चुनाव में महिलाओं के लिए सीट भी आरक्षित की। लेकिन पुरुषों ने अपने अपने घरों की कठपुतली महिलाओं को आगे कर राजनीति करनी शुरू कर दी। सौभाग्य से मेरे घर के पुरूष कभी भी मेरे ऊपर हावी नहीं होते, मुझे विवेकपूर्ण निर्णय लेने में साथ देते हैं। 

मैं अपने दैनिक सुविधाओं में कटौती कर संसाधन एकत्र करती हूं और उसे युवाओं के बीच वितरण करती हूं। आप सभी यह जानते ही होंगे कि चुनाव में पैसे को पानी की तरह बहाया जाता है। लेकिन मैं हमेशा से अपने समर्थकों को यही एहसास दिलाना चाहता हूँ कि मैं पैसे देकर वोट खरीदने के खिलाफ हूँ । लेकिन अपने हर जरूरतों में आपके साथ खड़ा हूँ। अगर मैं चुनाव जीत गयी तो लोगों की समस्याओं का आसानी से निराकरण करने के लिए निरंतर प्रयास करूंगी। लोगों को सरकारी सहायता, या किसी काम के कारण ऑफिस ऑफिस चक्कर लगाना पड़ता है इसके लिए मैं अपने कार्यालय में ऐसा प्रबंधन करूंगी कि लोग यहां आ कर या मोबाइल से ही अपनी बात दर्ज करवा सकते हैं ताकि उनका भागदौड़ कम हो सके।

इसमें कोई संदेह नहीं कि बिहार में जदयू ही एक ऐसी पार्टी है जहां महिला के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाता है।  शेष सभी पार्टियां पुरुषवाद के वर्चस्व से जकड़ी है।

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