‘निर्णय लेने के समान अधिकार’ से ही मिट सकता है बेटे-बेटियों में फर्क

BY THINKERBABU TEAM

हमेशा ये कहा गया है कि विकास के लिए बदलाव की आवश्यकता है। विकास की शुरुआत सामाजिक सोच में बदलाव से ही होती है। किन्तु केवल वैज्ञानिक विकास के बलबूते पर सामाजिक विकास की कहानियाँ नहीं गढ़ी जा सकती हैं। सामाजिक सोच, स्थापित रीति-रिवाज में ठहरे जीवन को परम्परागत ढर्रे पर चलने के लिए बाध्य करती है। फिर तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास, अर्थव्यवस्था में उछाल सब बेईमानी है। कारपोरेट जगत की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर सोशल सेक्टर में काम करने वाली रचना कुलश्रेष्ठ का मानना है कि महज विज्ञान और अर्थव्यवस्था के उछाल से सामाजिक जीवन के बदलाव तथा विकास को मापना गलत है।

दो दशक से अधिक समय तक कारपोरेट तथा सोशल सेक्टर में काम कर चुकी रचना कुलश्रेष्ठ साहित्य तथा कला जगत से भी जुड़ी हैं। उनकी कविताएँ एवं लेख दस से अधिक संग्रहों में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी एकल coffee table किताब ‘Eruptions of My Being’ भी प्रकाशित हो चुकी है। चार किताबों की संपादक तथा बहुमुखी प्रतिभा की धनी रचना,परिवार से लेकर कारपोरेट कल्चर तक में बसी रूढ़िवादी विचारों को बेपर्दा करने के लिए जानी जाती हैं।

रचना कुलश्रेष्ठ अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताती हैं कि आज भी कहीं न कहीं एक महिला के लिए सामाजिक निगरानी में रहने को ही अच्छा माना जाता है। भले ही वह पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर महिला ही क्यों न हो। उसे अपने हिस्से के हर निर्णय को लेने का अधिकार नहीं होता। उसे पारिवारिक मान्यताओं की कसौटी पर खरा उतरने के लिए आज भी मजबूर होना पड़ता है।

वैज्ञानिक विकास ने दुनिया के तौर-तरीके और जीवन शैली को बदला है परन्तु इस ऊपरी बदलाव से क्या वाक़ई सभी का जीवन बदला है? ठीक इसी तरह रूढ़िवादी विचारधारा भी अपना स्वरूप थोड़ा बदल कर, आधुनिकता का मेकअप कर इस बदलती दुनिया में मौजूद है। चाहे घर हो या दफ़्तर, चाहे रिश्ते-नाते हों या ऑफिस का बॉस, सब एक महिला की समीक्षा केवल उसकी योग्यता के आधार पर न कर के, दक़ियानूसी सोच के आधार पर ही करते हैं। रचना ने विभिन्न संस्थाओं में अपने कार्यकाल के दौरान न सिर्फ़ अपनी महिला सहकर्मियों के साथ यह होते देखा बल्कि स्वयं भी इस तरह का आचरण भुगता है, फिर चाहे वह कॉरपोरेट हो या सोशल सेक्टर। फिर भी तुलनात्मक रूप से वे आज के सोशल सेक्टर को ज़रा अधिक संवेदनशील और समानुभूति से भरा पाती हैं।


उनका मानना है कि अगर पारिवारिक परिदृश्य सुलझा हुआ हो, बेटों और बेटियों को समान अवसर प्राप्त हों तो उसी घर की बेटियाँ आगे चलकर सामाजिक बदलाव का कारक बन जाती हैं। वे एक विकसित समाज के निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी बन जाती हैं। यहाँ यह समझना बेहद ज़रूरी है कि केवल बेटों के बराबर बेटियों को पढ़ा देने से बेटे-बेटियों का फर्क नहीं मिटता है। असली फर्क तब मिटेगा जब बेटियों को भी बेटों के समान खुद के बारे में निर्णय लेने का अधिकार मिले। यही असली समानता है। और यह अधिकार तब स्वत: ही मिल जाएगा जब आज के अभिभावक अपने बच्चों को समान अवसर देंगे, हर मुद्दे पर उनसे खुल के बात करेंगे। पहला शिक्षक परिवार होता है, फिर मोहल्ला, फिर विद्यालय और फिर जीवन। 


आज तो लगभग हर घर की लड़कियों को स्कूल भेजा ही जा रहा है लेकिन उन्हें अपना निर्णय स्वयं लेने के अधिकार से वंचित रखा जाता है इसलिए आज भी परम्परागत सोच बरकरार है। और फिर यह तो आधारभूत अधिकार होना चाहिए। यदि हर व्यक्ति अपनी हर भूमिका में यह समझ पाए कि जहाँ उसे स्वयं निर्णय लेने का अधिकार है वहीं उसे अपने परिवार, मित्रों, सहकर्मियों आदि सभी को अपना निर्णय स्वयं लेने के लिए जगह भी देनी होगी और प्रेरणा भी।

रचना कुलश्रेष्ठ को इस बात का संतोष है कि उनके माता-पिता ने कभी भी उन्हें परम्परागत सोच से प्रभावित नहीं होने दिया। विशेषकर उनके पिता ने उन्हें और उनकी बहनों को आगे बढ़ने और खुद के बारे में निर्णय लेने से कभी नहीं टोका बल्कि हौसला बढ़ाया। उनकी माँ ने उन्हें स्वयं के लिए खड़ा होना सिखाया। लेकिन पुरुषवादी सोच केवल घर के अंदर ही नहीं होती और इसे बढ़ावा सिर्फ़ पुरुष ही नहीं देते बल्कि स्वयं महिलाएँ भी इसकी काफ़ी हद तक इसमें भागीदार होती हैं। तो जहाँ उन्होंने आज़ादी अपने घर में पाई उससे अधिक बन्धन उन पर कार्यक्षेत्र में सहकर्मियों या बॉसों ने लगाने की कोशिश की। यही सब आपके अपने ऑफिस में, कार्यक्षेत्र में भी मौजूद रह सकता है। इसका कारण यह है कि लोग योग्य महिलाओं को सीधे तौर पर स्वीकार नहीं कर पाते।महिलाकर्मियों को लेकर कई तरह की अनिश्चितताएँ बना दी गयी हैं। यह शादी के बाद जॉब कर सकती है या नहीं? ऑफिस के लिए कितना समय दे पाएँगी? यह हमेशा पति के अनुकूल ट्रांसफर के चक्कर में रहेगीं। बच्चे होने के बाद क्या ऑफिस को समय दे पाएँगी? यहाँ तक कि माहवारी से जुड़े हार्मोनल बदलावों से जब वह गुजरती है तो बहुत ही असंवेदनशील तरीक़े से उसे जज किया जाता है।


परन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि जिन सवालों को पैदा कर महिलाओं की योग्यता और काम के प्रति उनके समर्पण को नज़रंदाज़ किया जाता है, उन्हीं सवालों के जवाब को आसानी से ढूँढा भी जा सकता है। मिसाल के तौर पर कारपोरेट कल्चर में शादी करना तथा बच्चे पैदा करने को लगभग किसी अपराध के नजरिए से देखा जाता है। इसी संदर्भ में जब रचना से एक जॉब इंटरव्यू के दौरान उनकी शादी के प्लान पूछे गए तो सीधे तौर पर उन्होंने कहा कि मेरी शादी का आपकी संस्था से और मेरे काम से कोई लेना देना नहीं। 


सवाल अब यह है कि आधुनिक युग में अधिकांश लड़कियाँ पढ़ने लगी हैं, नौकरी-व्यवसाय करने लगी हैं फिर भी परम्परागत सोच में बदलाव क्यों नहीं हो रहा? और यदि हो भी रहा है तो गति अत्यधिक धीमी है। यह इसलिए कि जो महिलाओं की योग्यता को सहज स्वीकार नहीं करना चाहते वो उन्हें जाति-धर्म-परिवार और लिंग के बन्धनों में बँधे देखना चाहते हैं ताकि वो खुलकर सामने न आ सके, पुरुषों के वर्चस्व या एक सीमित विकसित महिला वर्ग की सत्ता वाली दुनिया में आगे न बढ़ सके।आज भी कई पढ़ेलिखे लोग जाति-धर्म-परिवार-लिंग के प्रतिमानों की मौजूदगी सुनिश्चित करना चाहते हैं ताकि उनके हाथ से ताकत और सत्ता की बागडोर कहीं और न चली जाए। इसलिए आज भी समाज में विस्तृत बदलाव नहीं हो पा रहा है। सत्ता और ताकत वर्ग में विचरती इस असुरक्षा की भावना बदला जाना तभी संभव हो पाएगा जब एक नई खुले दिमाग़ और दिल वाली पीढ़ी को हम इस देश में खड़ा कर पाएँगे वरना सारे प्रयास, समकालीन जनसंख्या की जड़ मानसिकता की तहों को खोलने में ही चले जाएँगे।

17 Replies to “‘निर्णय लेने के समान अधिकार’ से ही मिट सकता है बेटे-बेटियों में फर्क”

  1. I am glad that you have shared this, because this absolutely need of the hour. Decision and choice should be the sole responsibility and parents should encourage children (irrespective of gender) to take their decisions instead of parents taking all decision for the girl child.

    Thank you Rachna for penning it so beautifully.

    1. Congrats Rachna!!An honest writing!!A true observation of social nd corporate culture….kafi had tak aapne is ekadhikaar k liye sangharsh kiya h aur use safaltapurvak hasil bhi kiya h.looking forward for more such thoughtful writing.

  2. 100 % true…badlav humse hi Shuru hoga..parent decision lene k haq beta beti dono ko de. Bahut hi khubsurat tarike se apne samaj ka roop aur unki soch ko rakha h jo hum sabne bilkul anubhav kiya hai..

  3. Behatareen, Rachana. Logo ki loch ko badalana hoga. meine to yahan US mein dekha hai, saalon se reh rahi indian community ko wo bei kuchh alag nahi kar rahe bete betiyon ke liye. Soch wahi hai.

    1. Bilkul samajhti hun Didi.. aap jo keh rahi hain. Meine bhi notice kiya hai.. it’s all about the greed of power and gain over others

  4. Thought provoking Article Rachna. Thanks for your efforts to make this society aware of these attitudes of inequality .

  5. As techonology has advanced, the regressive nature of our Victorian mentality is coming to the fore. What is the use of advertising on a matrimonial website when we are still looking for a ” tall, fair, veautiful,homely (whatevee on the world is meant by that thouugh!) bride”?
    What is the use of imementing POSH in offices if recruiters still ask about lady candidates’weding and childbirth plans?
    Rachana is right; technologicl change will bring change in society but not progress.
    Progress comes when more women are put in greater charge of their lives

  6. I am happy to read such an important topic to be shared by Rachna Kulshreshtha.
    It is absolutely true that female should have this right ,then only we can think about any change in our society .This will also further strengthen our democratic system and our core political values.
    We should respect girl child decision in the family as well as in society
    Keep it up dear Rachana . 👍✍️
    Neena

    1. Thank you so much Neena Mamiji. 🙏🏼🙏🏼 I think the way you have led your life and raised your daughter to be independent decision maker for herself.. I think you’re the Change Maker yourself ♥️

  7. Good Write Up Rachsa,
    I am Sure, the next will be bigger and bolder. The Lady should and can always stand by the Right Decision.

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