क्षितिज के आगे : आत्मनिर्भर बेटी

बेटियां शादी के बाद पति के आंगन में बंद पिंजरे का तोता होती है। इसलिए परायी भी होती है। इस परम्परागत मानसिकता ने हमे हमारे ही बेटियों के लिए पराया बना दिया है। इस मानसिकता से हमारा समाज इस कदर सड़ चुका है कि बगैर पुरुषों पर निर्भर हुए नारी के  सुरक्षित जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। लेकिन इसी समाज में ऐसी कई बेटियां हैं जो विषमता फैलाने वाली सामाजिक बनावट को लांघकर अपने पूरे परिवार के लिए आत्मविश्वास का स्तम्भ बन चुकी हैं।
आज थिंकरबाबू में एक ऐसी बेटी की कहानी का जिक्र हो रहा है इसकी इच्छा शक्ति हिमालय सी अडिग है और दर्जनों निराश्रित परिवारों का आश्रय बन चुकी है।

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एक समृद्ध मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी भूमि राय बचपन से ही आत्मविश्वासी और पढ़ने लिखने वाली बेटी रही जो आगे चलकर प्रशासनिक सेवा में अधिकारी बनने के स्वप्न को साधने के लिए दिल्ली आकर पढ़ने लगी। परिवार की मर्जी से इन्होंने अपने मनपसंद लड़के से शादी की जो पढ़ाई में सहयोग करने लगे। एक तरह ये न्यायिक सेवा सहित कुछ और भी सरकारी प्रतियोगिता परीक्षा के मेंस तक निकाल रही थीं वही दूसरी ओर  दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में बतौर वकील प्रैक्टिस भी कर रही थी। एक बार ये जब कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही थीं इसी बीच इनकी मां का फोन आता है कि घर आ जाओ भाई की तबीयत खराब है।

इनके भाई को किडनी की गंभीर बीमारी थी। इन्होंने अपने भाई के जीवन की रक्षा के लिए अपनी एक किडनी देने का निर्णय लिया। इसके लिए इन्होंने थोड़े टाल मटोल के बाद अपने पति को भी राजी कर लिया। पर यह बात इनके ससुराल वाले को नागवार गुजरी। एक बार ये अपने सगे देवर की शादी में ससुराल गई थी इसी बीच डॉ ने इन्हें बुलाया इसके कारण बीच शादी में ही इन्हें लखनऊ वापस आना पड़ा। विधाता की इस विडम्बना ने इनके तथा इनके ससुराल के बीच की दूरी को बढ़ा दिया। इधर इनके भाई की तबीयत बिगड़ती चली गयी उधर पति इनसे दूरी बढ़ाते चले गए। कुछ महीनों बाद भाई की मौत हो जाती है। 


इनके पति इन्हें तलाक दे देते हैं। कुछ दिनों बाद पता चलता है कि इनके पति की किडनी भी खराब है। ये पति के पास जाना चाहती है लेकिन ससुराल वालों ने स्पष्ट मना कर दिया। बड़े होकर प्रशासनिक सेवा में जाने का ख़्वाब देखने वाली बेटी का एक-एक कर के सभी अरमान टूट गया। घरेलू कलह ने जीवन को झंझावात में धकेल दिया। ऐसे में प्रायः लोगों का आत्मबल खत्म हो जाता है लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी।


“सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।”
भूमि राय का जीवन संघर्ष से और निखर गया। उनका आत्मबल अब फौलाद सा हो गया।  हार मनाने के बजाए नए जीवन की शुरुआत की।  इन्होंने समाजसेवा कर लोगों के लिए जीने का निर्णय लिया और ‘रामरखी चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना कर जन सरोकार से जुड़ गई। निराश्रित लोगों के लिए भोजन, चिकित्सा की व्यवस्था करना, सामुहिक विवाह का आयोजन करना, गरीब बच्चों के लिए मुफ्त में स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था करना इनकी प्राथमिकता है।


आज न केवल लखनऊ में बल्कि देश के दर्जनों हिस्सों में वो लोगों की सेवा कर रही हैं। भूमि राय अपने आप में ही एक संस्था बनकर उभर रही है।

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