सोनिया मिनोचा

ईमानदार पहल से समाज को बदलने की कोशिश

ईमानदारी पूर्वक सामाजिक कार्य करने वाला इंसान ही समाज की असली सच्चाई को जान पाता है। विज्ञान और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में परचम लहराने वाले हमारे देश में लोगों की मनोदशा, उनका सामाजिक सोच कमोबेश वही है जो आज से दो-तीन दशक पहले हुआ करता था।  दरअसल, आज भी ज्यादातर लोग दूसरे की योग्यता, उसकी मेहनत, निःस्वार्थ प्रेम की कीमत नहीं समझ पाते। यही कारण है कि समाज में  व्यापक बदलाव नहीं हो रहा, संसाधन सम्पन्न समाज आर्थिक-सामाजिक असमानता का शिकार है। पर आज भी कुछ ऐसे लोग है जो दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं भले ही समाज उनकी महत्ता नहीं समझ पाए।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजधानी दिल्ली में रहने वाली सोनिया मिनोचा ने अपनी अच्छी खासी कमाई वाले करियर को छोड़ कर गरीब तबकोंं के बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लिया है। वो न सिर्फ इन बच्चों को पढ़ाती हैं बल्कि उन सबको जीवन मूल्यों से भी अवगत करवाने की पहल कर रही हैं। इनके पास दिहाड़ी मजदूूरी करने वाले मां-बाप या बेरोजगार मजदूरों के बच्चे आते हैं। सोनिया को मीडिया जगत में करने का दो दशको से ज्यादा का अनुभव है। फुटबॉल के प्रति बच्चों में जागरूकता फैलाने के लिए  FIFA U-17 WC India 2017  के तहत “मिशन 11 मिलियन” (Mission XI Million) प्रोग्राम का नेतृत्व कर चुकी है। गौरतलब बात यह है कि उन्होंने देश भर के कई हज़ारों स्कूलों को इस प्रोग्राम से जोड़ा कर फुटबॉल के प्रति बच्चों को जागरूक किया है। 

Wish Tree Project के जरिए सोनिया मिनोचा गरीब तबकों के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सतत प्रयासरत हैं।

सोनिया मिनोचा Wish Tree Project नाम की संस्था चलाती हैं जो गरीब तबकों के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए काम करती है। सोनिया मिनोचा शिक्षा, पर्यावरण तथा खेल के क्षेत्र के कार्यों के अनुभवी हैं जो किसी बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी तथा फॉर्मेट एंड कंटेंट डिज़ाइनर के रूप में लंबे समय तक काम कर चुकी सोनिया मिनोचा बच्चों के दिलोदिमाग को आसानी से टटोल लेती है। Wish Tree Project की संचालिका सोनिया मिनोचा को यह बात हमेशा खलती है कि जब देश की राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में बच्चों की सामाजिक परवरिश का स्तर ऐसा है, तो देश के दूसरे राज्यों खासकर छोटे शहरों, कस्बों तथा गांवों के बच्चों की क्या हालत होगी।

सोनिया ने दक्षिण दिल्ली के एक कॉलोनी के पार्क में दिहाड़ी मजदूरों या बेरोजगार मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने से अपने मिशन की शुरुआत कीं। अब वो रिहाइशी घर के पार्किंग एरिया में मजदूरों के बच्चों को पढ़ाती हैं साथ ही साथ उनके उचित पोषण का भी ख्याल रखती हैं। वो पढ़ाई के साथ-साथ पोषणयुक्त भोजन, किताबें, कपड़े उपलब्ध करवाती हैं।  वो क्रिएटिव तरीके से कंटेंट डिजाइन कर के बच्चों को जानकारी देती है ताकि स्कूल न जाने वाले तथा घर में भी पढ़ाई का माहौल न होने के बावजूद बच्चे उनकी बातों को समझ सकें। हालांकि पार्किंग एरिया में बच्चों को पढ़ना में भी कुछ चुनौती है। 

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 बच्चों के साथ सोनिया खुद भी क्लास रूम और उसके आस-पास की जगह को साफ-सुथरी करती हैं। इतना ही नहीं प्रकृति और हरियाली के महत्व को समझाने के लिए वो बच्चों के साथ बागवानी करती हैं, कम्पोस्ट बनाने का तरीका समझाती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा करने के लिए सोनिया मिनोचा को न तो कोई सरकारी सहायता मिलती है न ही किसी संस्था-समिति का सहयोग। उन्हें तो बस अपने घर के लोगों तथा कुछ दोस्तों, परिचितों का सहयोग मिल रहा है।

सोनिया मिनोचा मुस्कुराहट के साथ जवाब देती है कि कुछ अपने मेरे साथ हैं यही मेरे आत्मविश्वास का कारण है। वो अपने इस प्रयास को सामाजिक बदलाव की दिशा में किये जा रहे प्रयास के रूप में देखती हैं इसलिए वो सामाजिक भागीदारी के पक्षधर रहती हैं।  लेकिन उन्हें ज्यादातर मामलों में निराशा ही हाथ लगी है। उन्हें इस बात का खेद है कि हमारे समाज का विकसित हिस्सा सेवा की भावना से कोसों दूर अपने आप में ही व्यस्त है।


एक बात सोनिया मिनोचा के दिल को कचोटती रहती है कि ज्यादातर लोगों में दूसरों की मेहनत को सम्मान देने की आदत नहीं है। हम दूसरों को ‘थैंक यू’ कहने से परहेज रखते है। इसका असली कारण यह है कि लोग दूसरों की सच्ची मानसिक तथा निःस्वार्थ समर्पण को समझ ही नहीं पाते। और वो इस लिए नहीं समझते है क्योंकि उन्होंने खुद कभी निःस्वार्थ काम किया नहीं । जब हममें ईमानदारी से समझने की आदत जन्म ले लेगी तभी समाज में बदलाव आना भी शुरू होगा। सोनिया मिनोचा बताती है कि उनके विद्यार्थी सिर्फ स्कूली पढ़ाई में ही पीछे नहीं होते बल्कि उनके सोचने समझने का स्तर और बोलने का तरीका भी बहुत अशिष्ट होता है। किसी किसी बच्चे का बचपन तो जाने-अनजाने बिगड़ैल अधेड़ की तरह व्यवहार करता है। अश्लील गालियां तो उनके जुबान पर होती है। दरअसल, घर के बड़ों के जीवन की सारी गंदगियां बच्चे सीख चुके होते हैं। सोनिया मिनोचा इन बच्चों की सभी गन्दी आदतों को समझा बुझा कर खत्म करने की कोशिश करती हैं ताकि ये बड़े होकर एक बेहतर नागरिक बन सकें।

सोनिया मिनोचा बताती है कि बच्चे को बड़ो की तरह  बात बात में अश्लील गालियां देने की आदत हैं, भले ही  उनको गालियों के अर्थ का अहसास न हो।  सेण्टर के शुरुआती दिनों से ही वो इस व्यवहार से झूझ रही हैं।  यक़ीनन, यह अश्लीलता बच्चों के मानसिकता को दूषित कर देती है। उनका प्रयास बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने के है, बच्चों से गाली देने, झूठ बोलने तथा बात-बात पर झगड़ने की उनकी आदत को खत्म करने का है। इसके लिए वो बच्चों को रचनात्मक कार्यों के तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। वो आर्ट क्लास, डांस क्लास भी संचालित करती है ताकि बच्चे अपने अंदर की प्रतिभा को खुद समझ सके। वो बच्चों का बहुमुखी ज्ञानवर्धन के लिए कार्टूनस, फिल्म्स तथा डॉक्यूमेंट्री भी दिखाती हैं।


 वो बागवानी, पौधरोपण आदि के जरिये बच्चों को सकारात्मक कामों से जोड़ने का प्रयास कर रहीं है। हालांकि सेंटर संचालन के तो अभी एक ही वर्ष पूरे हुए हैं लेकिन सोनिया मिनोचा के इन रचनात्मक पहल से उनके बच्चों के आचरण में सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है। उनको उस वक्त बेहद खुशी होती है जब वो इन बच्चों को आपस में पढ़ाई, करियर और भविष्य के बारे में बात करते हुए देखते हैं। सोनिया का मानना है कि बच्चों का यह सकारात्मक बदलाव मेरे लिए बेहद खूबसूरत तोहफे के समान है लेकिन उनके भटकने की गुंजाइश अभी भी बची है इसलिए यह आवश्यक है कि इन बच्चों के माता-पिता की भी कॉउन्सिलिंग की जाय। आने वाले दिनों में सोनिया इस दिशा में भी काम करेंगी। 


जब बच्चों के सामने ही घर के बड़े झगड़ते हैं तो इसका भी कुप्रभाव बच्चों पर पड़ता है। बच्चों को पिता के द्वारा मां की पिटाई स्वाभाविक लगती है जबकि मां के हाथों से पीटने वाला पिता कायर लगता है। यह  कितना दुखद है कि प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले उम्र में ही स्लम के बच्चे पुरुषवाद के सभी क्रूर नियमों से परिचित हो जाते हैं।


सोनिया अपने इस काम से कुछ और लोगों को भी जोड़ना चाहती हैं। वो चाहती हैं कि  पढ़ाई या कला के क्षेत्र से कुछ एक्सपर्ट जुड़े। वो अब इन बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास का प्रबंध करना चाहती है ताकि एक्सपर्ट के लिए जुड़ना सहज हो सके। कोविड महामारी में परेशानियां और भी बड़ी है, सभी नियमों का पालन करते हुए पढ़ाने का काम जारी रखना भी एक चुनौती है

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2 Replies to “ईमानदार पहल से समाज को बदलने की कोशिश”

  1. She is a very good soul and she has been doing all this witout any financial support infact she is using all her own savings or some times people is same thinking support her. Great going I wish her and her NGO a big success in real to change the society .Long live Wish Tree Project.

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