ख़ुद्दारी पर शायरी

आत्ममुग्धता / ख़ुद्दारी पर शायरी

किसी को कैसे बताएं ज़रूरतें अपनी
मदद मिले ना मिले आबरू तो जाती है
नामालूम

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़तर

किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र ही किया है
ख़ुदा के घर भी ना जाऐंगे बिन बुलाए हुए
अमीर मीनाई

मैं तेरे दर का भिकारी तो मेरे दर का फ़क़ीर
आदमी इस दौर में ख़ुद्दार हो सकता नहीं
इक़बाल साजिद

वक़्त के साथ बदलना तो बहुत आसां था
मुझसे हर वक़त मुख़ातब रही ग़ैरत मेरी
अमीर क़ज़लबाश

दुनिया मेरी बला जाने महंगी है या सस्ती है
मौत मिले तो मुफ़्त ना लूं हस्ती की क्या हस्ती है
फ़ानी बद एवनी

आत्ममुग्धता /ख़ुद्दारी पर शायरी

जिस दिन मेरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके
इस दिन ख़ुदा शिगाफ़ मेरे सर में डाल दे
कैफ़ भोपाली

हम तेरे ख़ाबों की जन्नत से निकल कर आ गए
देख तेरा क़सर-ए- आलीशान ख़ाली कर दिया
एतबार साजिद

गर्द शोहरत को भी दामन से लिपटने ना दिया
कोई एहसान ज़माने का उठाया ही नहीं
हुस्न नईम

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमां से हम
हट कर चले हैं रहगुज़र कारवां से हम
इसरार उल-हक़ मजाज़

क्या मालूम किसी की मुश्किल
ख़ुद्दारी है या ख़ुद-बीनी
हैरत शिमलवी

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