आत्मनिर्भर होने पर भी कम नहीं होती महिलाओं की चुनौतियां

अंग्रेजी और हिंदी साहित्य की गहरी समझ रखने वाली स्नेहा प्रकाश ठाकुर की गिनती नारीवादी लेखिका के रूप में होती है। वेबसाइट और अखबारों में लेखन से जुड़ी रहने के साथ-साथ स्नेहा ‘पुस्तक-समीक्षक’ भी हैं।  साथ ही स्कूल में प्रिंसिपल की जिम्मेदारी का भी निर्वहन कर रही हैं।  आधुनिक समाज में महिलाओं की स्थिति पर जब उनसे कुछ सवाल पूछा गया तो उन्होंने इस प्रकार से बातें कीं। 

सवाल :  क्या किसी महिला के पढ़े-लिखे होने तथा आत्मनिर्भर बन जाने से उनकी सामाजिक चुनौतियां कम जाती है?

जवाब : जी बहुत ज्यादा बदलाव नही हो पाता है ,बल्कि मेरा मानना है कि पढे लिखे होने या आत्मनिर्भर होने पर हमारी चुनौतियां और ज्यादा बढ जाती है । क्योंकि जैसी हमारी समाज की मानसिकता है ,कि पढी लिखी या आत्मनिर्भर लड़कियां घर परिवार नही सम्भाल सकती या अच्छी पत्नी, मां ,बहु या बेटी नही बन सकती । और जैसी की हम औरते हैं, हम खुद को साबित करने के चक्कर में दुगुनी मेहनत से जुट जाते हैं दोहरी जिम्मेदारियों को निभाने में। हमें घर और बाहर दोनो जगह दोहरी मेहनत करनी होती है ,क्योंकि काम की जगह हो या घर हमे कमतर ही माना जाता है और हम खुद को बेहतर साबित करने के लिए लगे रहते हैं।

सवाल : जब शिक्षा से पुरुषों और स्त्रियों के बीच का अंतर नहीं मिटता तो इसके अंतर को खत्म करने के क्या उपाय हैं ?


जवाब : ये समझने के लिए आपको पहले हमारे समाज की मानसिकता को समझना होगा। हम एक पितृसत्तात्मक समाज में रहते है। यहां स्त्री और पुरुष के बीच का अंतर बहुत गहरा है, यह शिक्षा से खत्म नही होने वाला। जब तक हमारे समाज के पुरूषों की मानसिकता नही बदलती, वह अपने आपको भगवान की सबसे अनमोल कृति मानना और स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखना बन्द नही करेंगे ,तब तक कुछ नही हो सकता। उससे भी बड़ा रोल औरतों का है, वो जबतक दूसरी औरतों की इज्जत नही करेंगे ,उनका साथ नही देंगे ,हमारा समाज नही बदलेगा। क्योंकि अधिकांश मामलों में औरत ही जाने अनजाने पितृसत्ता को बढावा देती है। इसलिए इस अन्तर को खत्म करने के लिए औरतों को ही एकजुट होकर आगे आना होगा।

सवाल : आप किस सामाजिक रवैये में बदलाव की आवश्यकता महसूस करती हैं?

जवाब : सबसे बड़े बदलाव की जरूरत है ,महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए में। उनको जज करना, कभी कपड़ों से, कभी बोलने पर, कभी हंसने पर। औरतों को कमतर और पुरुषों से नीचे मानना दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। तीसरी है ,घर परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ औरत के ऊपर डालना। घर के महत्वपूर्ण मामलों में औरत की राय सुमार ना करना। औरत और मर्द को बराबर ना समझना । उनका मज़ाक उड़ाना, उनकी काबिलियत पर शक करना। अनगिनत मसले है जिनपर विस्तार से काम करने की जरूरत है। 

सवाल : क्या संपत्ति कानून महिला और पुरुषों के बीच के अंतर को खत्म कर रहा है ?


जवाब : अधिकांश मामलों में इससे कोई फर्क़ नहीं पडता। क्योंकि अधिकांश लड़कियां अपना हक मांगने का सोच भी नहीं पाती । क्योंकि उन्हें पता है कि हिस्सा मिले ना मिले उनका रिश्ता जरूर खराब हो जाएगा । जो कुछ लड़कियां अपना हिस्सा बिना लड़े ले भी लेती वो भी उसे अपना हक कम और अपने घरवालो का अहसान ज्यादा मानती है। 


सवाल :  जितनी तेजी से विज्ञान और तकनीक में विकास हो रहा है लेकिन सामाजिक मान्यताओं में बदलाव बहुत धीमी क्यों है?


जवाब : क्योंकि हम समाज में बदलाव चाहते ही नहीं हैं। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि हम पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं और हम इसके अभ्यस्त भी हो चुके हैं और हममे से अधिकतर को इसकी आदत हो गई है। और हम उसी चीज़ को बदलने और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं इसलिए हम विज्ञान और तकनीक को तो नए नए प्रयोगों से बेहतर बनाना चाहते है पर जब समाज की बात आती है तो हम इसको पूर्ववत रखना चाहते है और बदलाव को लेकर सहज नहीं होते। दूसरा कारण ये हो सकता है कि समाज की कमान जिन हाथो में है उन्हें बदलाव की जरूरत महसूस नहीं होती और जो विद्रोह या बदलाव की आवाज उठती है उसे वो आसानी से दबा देते हैं। 

सवाल : आप के जीवन में आत्मनिर्भर बनने के बाद कौन-कौन सी सामाजिक मान्यताएं संघर्ष के रूप में उपस्थित है?


जवाब : आत्मनिर्भर बनने का तो पता नहीं पर अपनी आवाज उठाने या महिलाओं के मुद्दे पर बात करने की वज़ह से मुझे  बहुत ज्यादा बोलने वाली, लाज लिहाज न करने वाली, औरत होकर मर्द की बराबरी की हिम्मत करने वाले जैसे तानों से नवाजा गया है। लोगों की तांका झांकी, उनकी मेरी हर बात को इनकार करना या कोई बात पसंद नहीं आने पर उसे अविवेकी बात के रूप में स्थापित कर देते है। कुछ लोग मेरी गम्भीर बात को भी मज़ाक में उड़ा देते है, कुछ बोलते है कि हां ज्यादा पढ़ गयी हो तो हमे ग्यान मत दो । आपके परवरिश के तरीको पर उंगली उठाना ,आपको अपूर्ण साबित करना यही सब चलता है। अभी तो बस शुरुआत है, देखिए आगे क्या होता है। 


‘राहें मुश्किल है,

दूर मंजिल है 

बस पहुंचने का हौसला है 

और धुँधले से रास्ते परचलते जा रहे हैं।’

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